कुसुम गोस्वामी 'किम'  
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Joined 6 May 2019


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कभी ज़िंदगी होती थी लाचार
अब मौत को भी लाचार कर दिया,
दूर होकर भी लोग होते थे पास
अब पास वालों को भी दूर कर दिया कोरोना ने...

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फ़क़त साँसों का पीछा करना नहीं...
एक कला है मुक़म्मल ज़िंदगी जीना

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दोस्त हों साथ तो...
महफ़िलों में क्या तन्हाइयों में भी रौनक है रहती
दोस्त हों साथ तो...मुसीबतें दो कदम दूरी पर हैं चलती
दोस्त हों साथ तो...पापा की डांट भी फ़ीकी है लगती
दोस्त हों साथ तो...बोरिंग क्लास भी अच्छी है लगती
दोस्त हों साथ तो...मंजिलों की दूरी नहीं है खलती
दोस्त हों साथ तो...अंधेरों में भी रौशनी है जलती
दोस्त हों साथ तो... ज़िन्दगी जिंदादिल है लगती

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दुश्मनी भी ज़रा देखकर किया कर दिल-ए-नादां
कि हर शख़्स को हक़ न दे ख़ुद को जलाने का

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जितनी मुठ्ठी बांधों उतनी ही चीज़ें फिसलती रहती हैं

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कुछ फ़र्ज़, कभी न चुकने वाले कर्ज़ होते हैं

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दर्द सहना आ जाए, हमको भी जीना आ जाए
ठोकर मारकर चल देंगे खुद अपने दिल को
काश हमको भी बेवफ़ाई का हुनर आ जाए

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दर्द सहा भी नहीं जाता
किसी से कहा भी नहीं जाता
जीना चाहते हैं हम और
ज़िंदा रहा भी नहीं जाता

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प्यार तो बेवज़ह होता है, साहेब!
नफ़रतों की वज़हें ठोस होती हैं,
कभी ग़लत फहमियां कर जाती है दूरियां
कभी गलतियां दूरियों की वज़ह होती हैं!!

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ग़लतियों को दोहराना दोगुनी ग़लती करने के समान है

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