Jyoti Jha   (ज्योति झा)
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~An Open Book Yet A Mystery
अजी..... आप यहां आए किसलिए...
Joined 27 May 2018


~An Open Book Yet A Mystery
अजी..... आप यहां आए किसलिए...
Joined 27 May 2018
Jyoti Jha 29 JUN AT 12:45

अब इसे लालच कहूँ
या नादानी
बस यूहीं एक दिन
पूजा पर बैठे हुए
मैंने ईश्वर से मांगी
"संसार की सबसे अनोखी सम्पति"
फ़िर उस बात को भूल भी गई
.....
उस दिन जब तुमने पहली बार
मेरा माथा चूमा था... मुझे
ईश्वर का वो
तथास्तु कहना याद आया

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Jyoti Jha 28 JUN AT 14:52

मेहंदी का रंग ग़र खूब
रचे तो पति खूब प्रेम करेगा
ये सोच
मन ही मन इठला जाती हैं

बाएँ गाल पर तिल हो तो
सास खूब मानेगी
ये सुन
निश्चिंत हो जाती हैं

किन्तु ये निश्छल प्रेम
दम तोड़ देती हैं
बियाह के कुछ दिनों बाद ही
खाने में नमक ज्य़ादा होने और
पति की बात मानने पर विवश होने से

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Jyoti Jha 20 JUN AT 15:22

जिसे तुम.... झरना कह
उसकी खूबसूरती का
इतना...बखान किए फिरते हो
...दरअसल
वो प्रेमी के वियोग में
तड़पती एक प्रेमिका के
अश्रुओं का बहाव हैं

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Jyoti Jha 10 JUN AT 12:21

तुम्हारा प्रेम..... चाँद के
समान ही घटता और बढ़ता रहा
सदा...
कभी पूर्णमासी के समान.. अत्यंत
तो कभी अमावस जैसा विलुप्त
और...
मैं हमेशा आकाश बन
तुम्हारी प्रतीक्षा में लीन रहीं



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Jyoti Jha 3 JUN AT 19:10


यदि प्रेम में पड़ना... तो प्रिय पर यूँ विश्वास करना
जैसे... आँखे करती हैं विश्वास उन चश्मों पर
जिसे पहन देख सकती हैं वो
पूरा संसार

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Jyoti Jha 1 JUN AT 10:54

मेरे लिए प्रेम... सदैव से वो अधूरा सा
स्वप्न रहा...जो अक्सर रात्रि के
अंतिम पहर में आती हैं... और मिलन
करा जाती हैं.... विरह के सवेरे से

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Jyoti Jha 29 MAY AT 10:57

तुम्हें लिखी.... सारी प्रेम पंक्तियाँ, कुछ आधे अधूरे नज्म
सब... जो मैंने आज तलक संजोए रखा... सिर्फ इसलिए
कि एक दिन मैं.... इन्हें सौप सकूँ अग्नि के हवाले
और बैठी रहूँ... वहीं पास में फ़िर जब आँखे बंद करके
धुएँ और तुम्हारी यादों में कहीं खोने लगूँ... उस क्षण
मैं चाहूँगी तुम्हारी पसंदीदा कविता की कोई चिंगारी
मेरे रूह पर ऐसे पड़े... कि मैं राख हो जाऊँ

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Jyoti Jha 28 MAY AT 18:44

बंधन में भी सूकून हैं साहब

कभी

महबूबा के पैरों में
पायल बांध के तो देखिए

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Jyoti Jha 24 MAY AT 19:02

देखे हैं मैंने अपने
सखियों...की पुस्तकों में
कितने ही मंदिरों...के
मिन्नतों के धागों को
...
सुना हैं...इससे ज्ञानवृद्धि
होती हैं, मैं भी.... तब से
अपने....प्रेमी के दिये
प्रेम पत्रों को पुस्तकों
के बीच सबसे कठिन
पाठ में रखने लगी हूँ

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Jyoti Jha 16 MAY AT 16:35

लौट रहा है वो
जो कभी इसी शहर
का हुआ करता था
मजदूर था साहब
सड़क लंबी बने
इसी लिए दुआ करता था
वफादार था वो
अपने गांव की तरह रहा खड़ा
ये तो शहर ही था जो
बुरे वक्त में बेवफा मालूम पड़ा

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