Jayantee Khare   (जयन्ती)
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Joined 27 April 2017


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17 SEP AT 20:36

कस्तूरी सा है यह सुक़ून भी
खुद में जिसे मैंने खोजा नहीं कभी
चाह में उसकी बन कर कोई हिरन
भटक रहा कबसे मन मेरा वन-वन

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17 SEP AT 17:38


सूखे से इस बियाबान में
कस्तूरी हिरन से लगे थे तुम
बिखरे तो थे फ़िज़ाओं में मुश्क़बू की तरह
मग़र उड़ ही गए फिर अचानक
यहीं कहीं थे तुम....
मग़र हो गए गुम...

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17 SEP AT 10:29

When the life
treading a tumultuous trek
in a
minimal
monochrome
margin,
An
unexpected
presence
colours the canvas
highlights the shadows
enlightens the path
re-kindles the flame
wraps with the warmth
contents the life...

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16 SEP AT 11:46

हर साँझ ढले
तुम्हारी नीली यादों
के स्याह साये रोज़ घिर आते हैं
आँखों की पोरों से
ठहरे हुए कुछ बेबस लम्हे
पलकों के झरोखों से छलक जाते हैं
पुरजोर कोशिशों के
बावजूद तुम्हारे मेरे लिए
होने के निशान नहीं मिल पाते हैं
बोझिल अन्देशों से
झांकते सुलगते सवाल
डूबते सूरज के सामने बिख़र जाते हैं

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15 SEP AT 21:45

ख़यालों को खुरचती रही
रात भर रचती रही
कुछ नज़्मों की कमाई की
ख़ुद को ही ख़र्चती रही

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15 SEP AT 8:13

अज़नबीयत के दश्त में
तुम्हारे वफ़ा के क़दमों के निशां
मेरे जज़्बात की रहनुमाई करते हैं...

अनजान अँधेरे शहर में
तुम्हारी मौजूदगी के चमकते जुगनू
रोशन मेरे रास्तों की तन्हाई करते हैं...

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15 SEP AT 8:00

मैदान ए जंग में काफ़िला छोड़ जाता है
कभी-कभी कोई कितना तन्हा हो जाता है

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10 SEP AT 17:35

कुछ ख्वाब यूँ नायाब हुए
कि कभी न क़ामयाब हुए,
अल्फ़ाज़ में जब सज गए
इक मुकम्मल किताब हुए!

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8 SEP AT 20:23

मुहब्बत की मिसरी से पगे
कुछ लफ़्ज़ मिसरे बनकर
मन की वादियों में
तन्हाइयों के दश्त में
आज भी हर वक़्त
बाज़गश्त करते हैं....!

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8 SEP AT 19:38

दोस्ती के भी दौर आते हैं
हर तरफ़ वही लोग
नज़र नहीं कोई और आते हैं
सुबह शाम हर रोज
और फ़िर एक दिन
सिर्फ अजनबीयत!

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