Hasit Bhatt  
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Joined 30 August 2016


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2 DEC AT 22:41

दिल गिला करते हो अपने घर को याद कर
उसे याद तक नही कि हुआ करता था कोई
माना छोड़ जानेवाले को भूल जाना भला
मगर हक नही वहां बसा भी कैसे रहे कोई

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24 NOV AT 18:34

કબૂલ કર્યો ડૂબવાનો અંજામ, સહારો મળી ગયો
નાખુદા ગણો કે કશ્તી, જોઈ કિનારો વળી ગયો

અપેક્ષાના બોજ વગર, પડે દોડવું સહેલું તો ઘણું
છેલ્લી ફાળમાં કમબખ્ત એક સહારો નડી ગયો

કોઈ સમજે વિશાળ આભ પક્ષપાત નહિ કરે
જેવી થઇ છે સાંજ, સૂરજના રંગે ભળી ગયો

આમ જીવનના કડવા ઘુંટનો સ્વાદ પૂરો લેતો રહું
અમી છાંટણા ન જાણે હું કેમ પ્રત્યેક ગળી ગયો

નિર્ણયો છોડી દેવા હતા બધા મારે એના ભરોસે
હવે એવો વહેમ છે ખુદા મારી બાજી કળી ગયો

ગીતા ગણો કે જીવની, લખવી તી મારેય હસિત,
લખવું હતું જે બધું, મરીઝ પહેલેથી લખી ગયો

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16 NOV AT 16:21

याद रखना, फुसलाना नहीं आता, मनाना नहीं आता
राह चुन लोगे दूसरी अगर, हमे समझाना नहीं आता

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2 NOV AT 22:16

अपनी जिम्मेदारी के बंधनों से बंधा हूं
अपनी ख्वाहिशों के वज़न से लदा हूं
पर्वत हूं इक महाकाय अपने आप में
मगर पशु पंछी और पेड़ से ही सजा हूं

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2 NOV AT 13:35

तुम्हारी आहट पर, आँखो की खिड़कियां बंद कर लेता हूं मैं अपने हाथो से
मगर अंदरूनी सतह पर फिर भी जमती है बूंदे बाहर बरसती बारिश की

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2 NOV AT 12:36

काबिल हो या नही वो तर्क नही करती
कतार में कब से हो वो फ़र्क नही करती
चुपके से मिलती है पसंदीदा लोगो से
किस्मत हम जैसों से संपर्क नही करती

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31 OCT AT 14:12

इक अदना सा आदमी अंजान था
सपनों को लेकर कुछ मुंतजिर था
बस थम सा गया, वक्त बीतता रहा
शतरंज की बाज़ी का वो वजीर था

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31 OCT AT 3:30

वो आंखें मिला नही पाते, उनके रंग में रंग जो गए है
कांच का टुकड़ा हुआ करते थे, आइना बना दिया

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31 OCT AT 3:25

वक्त तो फिजूल ही बदनाम है,
अजीब अगर है कोई तो इंसान है
मन्नते मांगी जाती थी जिसके लिए
मिल न जाए कहीं आज ऐसा फरमान है

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30 OCT AT 17:55

मेरा प्यार अंधा न था, तुम्हारी आंखें कुछ आफताब थी
कुछ खिलोने सिर्फ सूरज की रौशनी के दम पर चलते है

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