Geetika Chalal   (insta- @geetikachalal04)
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Joined 29 July 2018


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Joined 29 July 2018
20 DEC 2021 AT 21:43

वक्त कहाँ तुम्हें?

मैं नाम की मोहब्बत। कहीं रोग तो नहीं?
वक्त कहाँ तुम्हें? कहीं बोझ तो नहीं?

तुम्हारी सुबह की शुरुआत कभी मुझसे हुई नहीं।
तुम्हारे दिन का हर वक्त दफ़्तर ने छीन लिया।
घड़ी ने जब आज़ाद किया तुम्हें शाम के छोर पर
तुमने वो वक्त भी दोस्तों में बाँट दिया।

ना सुबह तुम्हारा साथ था, न दिन से कोई उम्मीद थी।
तुम्हारी शाम एक क़ैदी थी, अब बाक़ी बस रात थी।

चाहत इतनी थी कि रात तरस करे मुझ पर
और तुम्हारे वक्त का एक क़तरा मेरे नाम कर दे।
वो क़तरा मेरा बस इतना सा काम कर दे
सिर्फ़ मैं याद रहूँ तुम्हें, बाक़ी सब को अनजान कर दे।

मेहरबान तुम हुए नहीं, तुम भूल गए मुझे
मिलकर रात और नींद ने, कर ली फिर साज़िशें

तुम बेफ़िक्र होकर सोते रहे, टूटी सी मैं सोचती रही
मेरी अहमियत तुम्हारी ज़िंदगी में, आख़िरी से भी आख़िरी नहीं।
ना जाने कब रात बीती- कब सुबह हो गई!
पर तुम्हारी ये सुबह भी मुझसे शुरू हुई नहीं।

मैं नाम की मोहब्बत। कहीं रोग तो नहीं?
वक्त कहाँ तुम्हें? कहीं बोझ तो नहीं?(गीतिका चलाल)
@geetikachalal04

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15 NOV 2021 AT 11:20

इश्क़ का रंग

इश्क़ का रंग लेकर आया, दीवाना मुझे रंगने
इक नज़र ही काफ़ी थी, मुझे लाल करने को
शर्म का बोझ लादे रही, पलकें उठी न एक बार भी
उसका आना ही काफ़ी था, ये दिल बदहाल करने को

नाकाम दूरियां! रंग इश्क़ का, फीका न कर सकी
दूरी 'दूरी' न थी, गुम रहे एक - दूजे के ख़्याल में
मौसम बीते, अरसा बीता, इश्क़ भी निखरता रहा
और दीवाना लौट आया, मुझे अपना बनाने हर हाल में

ज़ाहिर करती कैसे, कि कब चढ़ा मुझ पर रंग उसका
वो दीवाना नज़रअंदाज़ करता रहा, फिरता रहा भीड़ में
शर्म भी, डर भी और कमब़ख्त! ख़ुमार इस चाहत का
क्यों न रंगती इश्क़ में, क्यों न घोलती रंग तक़दीर में

मैं भी हुई दीवानी, अरसे बाद मिलकर दीवाने से
काबू न हुई हलचल, दिल भी न अब संभले
चढ़ जाए रंग ऐसा गहरा, अब कयामत तक न उतरे
आख़िर! इश्क़ का रंग लेकर आया, मेरा दीवाना मुझे रंगने (गीतिका चलाल)
@geetikachalal04

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30 SEP 2021 AT 0:45

मुझसे प्यार करते।

तुम भी वही जज़्बात रखते
वही शिद्दत, वही एहसास रखते
एक बार सुन लेते मुझे ग़ौर से
फिर ताउम्र अपनी बात रखते
ये दूरियाँ ख़ाक करते, या ख़ाक दहकता अंगार करते।
या तो इल्तिजा नज़रअंदाज़ करते या मुझसे प्यार करते।।

मैं यूँ न रोती ज़ार - ज़ार तन्हाई में
मैं यूँ न होती बेज़ार इस जुदाई में
न भीगता सिरहाना, न भीगती चादर
मैं यूँ न गुम होती, यादों की परछाई में
सीने से लगाते, या ख़ंजर मेरे, सीने से पार करते।
या तो मेरा क़त्ल करते या मुझसे प्यार करते।।

लम्बी दास्तान नहीं, बस ज़रा सी बात थी
उन हालातों में न तुम बर्बाद थे, न मैं आबाद थी
थाम तो लिया था हाथ मेरा, उस बचपने में
पर उस दिल्लगी में, न तुम क़ैद थे, न मैं आज़ाद थी
फ़रेब ही कह देते मेरी इबादत को या यक़ीन एक बार करते।
या तो बेइज़्ज़ती इतनी असरदार करते या वाक़ई मुझसे प्यार करते।। (गीतिका चलाल)

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14 SEP 2021 AT 14:19

माँ हिंदी नीर बहाए

मूक क्यों तुम बने यहां? करते न क्यों तुम न्याय?
बीच सभा में पूछ रही माँ हिंदी नीर बहाए
क्यों पीड़ा न समझे पीढ़ी, क्यों करें मुझे असहाय?
बधिर सभा से पूछ रही, माँ हिंदी नीर बहाए

मेरे ही अंश सब तुम, मैं ही यशोदा - देवकी
यदि त्याग मेरा शून्य है, परिभाषा क्या स्नेह की?
लज्जा कैसे मेरे स्वर से? मैं ही प्रथम अध्याय
आज मांग रही है उत्तर, माँ हिंदी नीर बहाए

तीव्र समय की धार में, स्वीकारा सब परिवर्तन
स्वीकारा स्वयं का खण्डन, सब कुछ किया है अर्पण
क्या सम्मान नहीं इस माँ का? क्यों अपमान मेरा किया जाय?
रूदित स्वर में पूछ रही, माँ हिंदी नीर बहाए

क्यों मूकबधिर है सभा, क्यों खड़े सब सिर झुकाए?
प्रश्न सभी से पूछ रही, माँ हिंदी नीर बहाए
क्यों आघात मेरे अस्तित्व पर, कौन वास्तिवकता मेरी बचाए?
निराधारों से आधार मांग रही, माँ हिंदी नीर बहाए (गीतिका चलाल) @geetikachalal04

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12 SEP 2021 AT 23:54

क्या फ़ायदा?

धुआं उठने दे ऊँचा, फ़साना यूँ ही चलता रहेगा।
अब घबरा कर मोहब्बत करने का, क्या फ़ायदा?

दिल पर ज़ोर नहीं मेरा, इसे होना है बस तेरा
अजी! डर कर रिश्ते निभाने का, क्या फ़ायदा?

जलने दे ज़माने को, हमारी मोहब्बत की आग से
ज़ालिम शहर को न जलाए, तो क्या फ़ायदा?

अभी तो बस शुरुआत है, पत्थर हजार लगेंगे हमें
बिन चोट के, सब हासिल हो जाए तो क्या फ़ायदा?

मुद्दा होगा - बवाल होगा, हर दिन नया सवाल होगा
एक भी ज़ुबां पर, ताला न लगाए तो क्या फ़ायदा?

हर चौराह पर, बेग़ैरत - बेअदब कहे जायेंगे हम
तीर मुस्कुराहट का न चलाए, तो क्या फ़ायदा?

अब ख़ैरियत न पूछेगा कोई, ख़िलाफ़ होंगे सभी
अपनी दुनिया के ख़ातिर, बग़ावत न कर पाए तो क्या फ़ायदा?

क्यों शर्म से लिपटे, जब क़ुसूर नहीं मोहब्बत
बेख़ौफ़ टकरा कर झुका न दे ज़माना, तो क्या फ़ायदा? (गीतिका चलाल) @geetikachalal04

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12 SEP 2021 AT 2:07

अधूरी मोहब्बत
रोज़ तेरा मरना, रोज़ ख़ुद पर सितम
दर्द से मोहब्बत ज्यादा, ख़ुद से मोहब्बत कम

छोड़ दे आदत, मेरे ज़िक्र की हर बात पर
पास नहीं मैं तेरे, पर फ़िक्र अब भी होती है
गुज़रा वक्त 'आज' बनता नहीं कभी भी
पर तू है अज़ीज़ अब भी, तेरी कद्र अब भी होती है

दर्द से दिल्लगी, मुफ़्त है गम के बाजार में
वफ़ा महंगी है यारों! इस इश्क़ के सौदे में

तेरी शिद्दत - तेरी मोहब्बत, तोड़े न मेरी ख़ामोशी
काफ़ी है साबित करने को, हूँ मैं बेहद पत्थर दिल
न ज़ाया कर वक्त मुझ पर, न अब मुझे याद कर
मैं भूली नहीं कुछ भी, कि क्यों हूँ मैं अब पत्थर दिल

दिल ही है बेचारा, नादानियां बार - बार करता है
चोट लगती है प्यार से, फिर भी प्यार करता है

न दे सजा ख़ुद को, न बना यादों को सलाखें
उम्रकैद इंसाफ नहीं, एकतरफा मोहब्बत के लिए
ना बन इतना दीवाना, ना भूल अपनी दुनिया
मैं बनी नहीं कभी भी, तेरी बेइंतहां चाहत के लिए

उस वक्त मेरी दीवानगी को, तेरी आवारगी मिली
अब मेरी आवारगी, तेरी दीवानगी चाहती नहीं

बिछड़ा प्यार लौट आए तो ज़ख्म ताज़ा करती है
घाव से भरे दिल की, याददाश्त अच्छी होती है
अब न कर इंतज़ार, वक्त में दफ़न प्यार का
टूटी कांच सी मोहब्बत, सिर्फ़ दर्द ज्यादा देती है

ज़िंदगी, गुज़रे 'कल' को थाम कर दौड़ती नहीं
'अधूरी मोहब्बत' कभी भी, पुराने अंदाज़ में लौटती नहीं (गीतिका चलाल) @geetikachalal04

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10 SEP 2021 AT 14:59

एक बार

मैं लिख रही अपने जज़्बात।
तू आ कर पढ़ ले एक बार।।
हर हर्फ़ अब बना रहा नाम तेरा।
देख ले मेरी दीवानगी एक बार।।

हर वक्त तुझे, महसूस करती हूँ ख़ुद में।
तेरी तमाम यादों से, ख़ुद को सजा लिया।।
तेरी एक भी तस्वीर, मिटाती नहीं ज़ेहन से।
बीते लम्हों को अब, जीने का ज़रिया बना लिया।।
मेरी साँसें - मेरी धड़कनें अब भी तेरी क़र्ज़दार।
मेरी दुनिया है तेरी यादें, हक़ीक़त होने दे एक बार।।

तेरी यादों से, रिहाई नहीं चाहती।
अब तन्हाई भी, सूनी नहीं लगती।।
हां ! मैं रंगी, इस क़दर तेरे रंग में।
तुझसे दूरी भी अब, दूरी नहीं लगती।।
इन्तज़ार के समंदर में, डूबी मैं कईं बार।
तू ले आ कश्ती और बचा लें मुझे एक बार।।

मैं तक़दीर मान बैठी इस फ़ैसले को।
तू दूर मुझसे, मैं तूझसे कभी जुदा नहीं।।
मैं थी कल भी तेरी, मैं हूँ अब भी तेरी।
है यादें ही सब कुछ, गर तू मेरा हुआ नहीं।।
सारे लम्हें संभाले है मैंने, है तुझसे अब भी प्यार।
लिपटी हूँ अब भी तेरी यादों से, तू मिल मुझसे एक बार।। (गीतिका चलाल)

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14 JUN 2021 AT 1:20

विनम्र निवेदन!

जब तक मैं सलवार - कमीज में थी, चरित्रवान थी।
लेकिन जिस दिन कपड़ों का माप छोटा हो गया
लोगों की सोच ने भी छोटा होना बेहतर समझा।
किसी ने कहा- "बदन ढकना नहीं जानती, संस्कार क्या जानेगी? "
किसी ने कहा-"अपने पिता से, अपने भाई से शर्म नहीं?
बेशरम! ढंग के कपड़े पहन ले, गली में जवान लड़के है।"

ऐसी सोच रखने वालों सादर प्रणाम!
हो सके तो उस दुकान का नाम बताना
जहां संस्कार की फैक्ट्री में बने संस्कारी कपड़े बिकते हो।
और हां! माफ करना इस खोटी सोच ने मेरे घर पर जन्म नहीं लिया कि
मुझे मेरे पहनावे से तोला जाये।

घर के आदमी जब छोटे कपड़े पहने तो क्या पिता ने कभी ये कहा-
" मां से, बहन से शर्म नहीं?
बेशरम! ढंग के कपड़े पहन ले, गली में जवान लड़कियां है।"
अगर नहीं। तो विनम्र निवेदन!
विचार साफ रखिए।
नज़रिया साफ रखिए।
जब ख़ुद को छोटे कपड़ों के तराजू में तोलते नहीं।
तो लड़कियों को भी ऐसी सोच की ज़रूरत नहीं।
विचारों का मान रखिए।
दर्जा भी समान रखिए।
सलीका मत सिखाइए कपड़े पहनने का।
हक़ हर किसी का समान है जीने का।

कपड़े देख कर किसी के संस्कार/चरित्र/योग्यता का आंकलन मत कीजिए।
कृपया सोच का मैलापन दूर कीजिए।

विनम्र निवेदन!
आदमी हैं तो लड़कियों के कपड़ों के चयन का सम्मान कीजिए।
औरत हैं तो औरत हो कर उसके इस चयन का अपमान मत कीजिए।(गीतिका चलाल) @geetikachalal04

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10 JUN 2021 AT 13:44

हमें प्रेम में रहने दो।

प्रश्न अनेक उठेंगे अब हमारे प्रेम पर,
गर्जन तुम्हारी मौनता की आक्रामक थी।
काले मेघ बरस रहे, अभी और बरसेंगे।
मेरी चपलता, तुम्हारी मौनता में विलीन थी।

ये संचित प्रेम, प्रवाह से कब जल-प्रपात बना?
कब दुविधाओं ने तुम्हें मुक्त किया?
कैसे साहस ने तुम्हारा आलिंगन किया?
ये मौनता का बाँध कैसे तुमने तोड़ लिया?

मैं मानती रही अभागा स्वयं को।
मेरी प्रतीक्षा का अंत न था।
मैंने स्वीकारा - मैं सीता न थी।
मैं दासी तुम्हारी, मैं मात्र मीरा।

चक्रव्यूह अति जटिल है अब भी
जाति का, धर्म का, कुल का, गोत्र का।
तुममें-मुझमें, क्या सामर्थ्य है इसे तोड़ने का?
चक्रव्यूह अति जटिल है अब भी
दर्प में लिप्त नीति का, आडंबर में लिप्त समाज का।
तुममें-मुझमें, क्या सामर्थ्य है इसे तोड़ने का?

मैं निश्चिन्त हूं अब कि तुमने स्वीकारा मुझे।
मैं निश्चिन्त हूं अब कि ये प्रेम कुंचित मर्म नहीं।
मुझे इस क्षण हर्ष में जीने दो।
मेरा ईश्वर भी जनता है - निस्वार्थ प्रेम का कोई अंत नहीं।

तुम्हारी मौनता ने सिद्ध किया - प्रेम का स्वरूप केवल विवाह नहीं।
तुम्हारी गर्जन ने सिद्ध किया - प्रेम में कोई भेद नहीं।

निवेदन! इस समाज से। प्रार्थना! प्रत्येक नीति से।
हमें मौन रहने दो। कोई प्रश्न ना करो।
सब स्पष्ट है। अब केवल हमें प्रेम में रहने दो। (गीतिका चलाल) @geetikachalal04

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10 MAY 2021 AT 20:53

नीलामी बाक़ी है।

मौत ने चाहा मेरी नज़र खौफ़ में हो
पर उस वक्त मैं भी उसका साथ चाहती थी।
उसे पसन्द ना आयी मेरी ऐसी गुस्ताख़ी
और उसने ज़िंदगी से मेरा सौदा कर दिया।
डर को ना पा कर मुझमें, वो मुझे डरा कर बोला -
" अभी वक़्त नहीं आया है, तुझे परखना बाक़ी है।
अभी तेरी नुमाइश बाक़ी है, तेरी नीलामी बाक़ी है।"

मैं घसीटी गयी दर्द के बाज़ार में
दर्द के दलालों ने कईं हिस्सों में मुझे बेच दिया
मैं थकी नहीं। मैं लड़ती रही
पर उन ख़रीददारों ने रहम न की
मेरे सुकून को बेचैनी ने ख़रीदा
मेरी मुस्कुराहट को तकलीफ़ ने ख़रीदा
मेरी काबिलियत को घमंड ने ख़रीदा
मेरी मेहनत को आलस ने ख़रीदा
मेरे सब्र को गुस्से ने ख़रीदा
मेरी मोहब्बत को नफ़रत ने ख़रीदा
मेरी ख़ुद्दारी को लालच ने ख़रीदा
मेरी वफ़ादारी को फरेब ने ख़रीदा
अब मेरे सारे जज़्बात टुकड़ों में बिक गये थे
ख़रीददार इनके बेहद ज़ालिम निकले

धीरे-धीरे गूंगा होना, बेहरा होना सीख लिया
मैंने भी इंसानियत को निगलना सीख लिया
बंद आँखों से बेरहम बन कर जीना सीख लिया
ज़िंदगी को बेबसी में गिड़गिड़ाते देख लिया
अब वाक़ई मौत से डरना सीख लिया

परख कर सब, मौत दूर से ही मुझे घूरती है
रोज़ मेरी साँसों की खैरियत पूछने आ जाती है
इंतज़ार है उसे, मेरी हिम्मत के बेघर होने का
खौफ़नाक मंजर में 'बेहद' हैवान होने का
अब यहाँ सिर्फ़ मेरी उम्मीद की नीलामी बाक़ी है।(गीतिका चलाल)@geetikachalal04

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