Ek Khwab Si Ladki  
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Joined 12 February 2018


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Ek Khwab Si Ladki YESTERDAY AT 17:42


किसी का दिल दुखाने का हमारा दिल नहीं करता
नए रिश्ते बनाने का हमारा दिल नहीं करता

(Read complete Ghazal in caption)

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Ek Khwab Si Ladki 6 NOV AT 18:06

मुहब्बत आज़माना चाहते हैं
तुम्हारा दिल दुखाना चाहते हैं

(Read complete Ghazal in caption)

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Ek Khwab Si Ladki 17 OCT AT 17:42

हमारी हर ख़ुशी में हमसे ज़्यादा ख़ुश हुआ है 'यार'
हमारे वास्ते इक दोस्त, भाई, रहनुमा है 'यार'

है पेशे से तो प्रोफेसर मगर बच्चों सा दिल उसका
कि छोटी छोटी बातों पर खुशी से नाचता है 'यार'

ग़ज़लगोई का पैमाना रही है हर ग़ज़ल उनकी
हमेशा से हमारा दिलरुबा शायर रहा है 'यार'

बना है मौज़ू वो अपनी कई नायाब ग़ज़लों का
कभी दरिया कभी बादल कभी जंगल बना है 'यार'

ज़मीं ज़रख़ेज़ वो आँखें उगाती है अलग कुछ 'ख़्वाब'
बनाना मिट्टी से सोना बख़ूबी जानता है 'यार'

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Ek Khwab Si Ladki 11 OCT AT 16:04

रह रह के उठ रहा है ये जाने कहाँ कहाँ
इस दर्द-ए-इश्क़ के हैं ठिकाने कहाँ कहाँ

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Ek Khwab Si Ladki 5 OCT AT 23:02

अकेलेपन से दिल घबरा रहा है
मुझे वो आज फिर याद आ रहा है

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Ek Khwab Si Ladki 2 OCT AT 20:11

// ग़ज़ल //
(Read in caption)

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Ek Khwab Si Ladki 29 SEP AT 19:07

फूलों का फ़न अलग है अलग ख़ार का हुनर
है सबसे अलहदा मेरे किरदार का हुनर

हय! काश इक निगाह उठे उसकी मेरी ओर
तो मान ले वो हुस्न-ए-रुख़-ए-यार का हुनर

ता-उम्र साथ देती नहीं ख़ूबसूरती
लेकिन जवाँ रहेगा सुख़न-कार का हुनर

ताक़त मेरे क़लम की मुकाबिल है दोस्तो
दरकार मुझको क्यूँ रहे तलवार का हुनर

सीलन तमाम कमरे की कर ले है ख़ुद में जज़्ब
ऐ चश्म-ए-नम तू सीख ये दीवार का हुनर

मुझसे किसी का दिल कभी तोड़ा नहीं गया
आया कभी नहीं मुझे इंकार का हुनर

एवज़ में 'ख़्वाब' के जो हक़ीक़त खरीद ले
किस काम का है ऐसे ख़रीदार का हुनर

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Ek Khwab Si Ladki 15 SEP AT 20:33

अलाव-ए-इश्क़ में पैहम जला हमारा दिल
हमारे सीने से उठती है अब तेरी खुश्बू

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Ek Khwab Si Ladki 11 SEP AT 11:04

अफ़सुर्दगी ये कैसी ये इज़्तिराब कैसा
वो दूर जा रहे हैं.. दिल खून हो रहा है

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Ek Khwab Si Ladki 3 SEP AT 17:47

ज़र्द चेहरे पे खुश लिबास आँखें
खूब हँसती हैं महव-ए-यास आँखें

रूप धर लें कभी ये दरिया का
तो कभी ओढ़ लेती प्यास आँखें

ईद का चाँद है तू और तेरी
राह तकती हैं बारह-मास आँखें

रूह को रूह से हो कैसे इश्क़
न तो दिल है न उसके पास आँखें

हर नज़र को नसीब क्यूँ हों हम
हमको देखें वही दो ख़ास आँखें

ज़ह्न करता है तेरे गिर्द तवाफ़
जब न हों तेरे आस-पास आँखें

मेरी आँखों में सिर्फ़ तेरे ख़्वाब
'ख़्वाब' की मुंतज़िर पचास आँखें

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