दीप शिखा  
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Joined 5 July 2018


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Joined 5 July 2018

फ़िक्रमंद होकर भी बेफ़िक्र नज़र रखता है,
वो आईना है मेरा, मेरी सारी ख़बर रखता है,
भूल जाती हूँ खुद को, कभी जो सांझ ढले,
दिए की लौ सा वो, अपना असर रखता है!

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दीप शिखा 20 JAN AT 12:15

बदस्तूर जारी है ज़माने में जिसका ज़ुल्म-ओ-सितम,
हाँ, इश्क़ वो दर्द है जिसे कुछ लोग दवा कहते हैं !

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दीप शिखा 7 JAN AT 18:58

you will find yourself alone....

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दीप शिखा 4 JAN AT 10:31

गर देख लेते आईना उंगली उठाने से पहले,
छींटाकशी दामन की कम हो गई होती !

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दीप शिखा 1 DEC 2019 AT 18:20

एक धुंधलका जीवन सा,
और एक कहानी शब्दों सी,
आकाश स्वप्न शिलाओं सा
स्नेह अंकुरित प्रारब्धों सी,
अविरल होना अब निश्चित है
चंचल मेरी कविताओं का,
तुम पूर्ण विराम प्रत्याशा से
मैं अल्प विराम संबंधों सी !

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दीप शिखा 30 NOV 2019 AT 18:10

नहीं थमती दासतां, जिस्म-औ-रूह ज़ार करने की,
और बाकी है क्या, दरिंदगी की हद पार करने को,

आग फिर उठी हैं, अंगारे दहके हैं आज, चारों तरफ
काट दो उंगलियाँ, जो उठे इज्ज़त तार करने को,

वो बेटी किसकी थी, मत पूछ मुझसे ऐ रहगुज़र
तैयार रह, उन नामुरादों के टुकड़े हज़ार करने को!

आबरू जाने कितनी, हर रोज़ कुचली जाती हैं,
नोंच ले वो गंदी नजरें, उठे जो गंदे वार करने को,

क्यों हो झिझक, क्यों डर बेटियों की आँखों में,
ज़रूरत अब, खुद हाथ अपने हथियार करने को !

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दीप शिखा 14 OCT 2019 AT 14:29

ये कुदरत की कारीगरी है या ख़ुदा की इनायत,
रंग सोने सा है मेरी मेहनत का और हाथ मैले हैं !

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दीप शिखा 28 SEP 2019 AT 16:35

साथ हैं रंग हजारों बस तेरा साथ नहीं,
चाँदनी अब भी होती है मगर वो रात नहीं,
दु:ख इस बात का नहीं कि हम तन्हा हैं,
ख़्यालो में भी होती तुझसे मुलाकात नहीं !

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दीप शिखा 28 SEP 2019 AT 14:40

उम्र का ये दौर और ख़ामोशियों का सफर,
ऊंचे मकानों में तन्हा, हम अपने घर का पता पूछते हैं !

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दीप शिखा 26 SEP 2019 AT 18:00

चुभा करती हैं खामोशियाँ तन्हा रातों में,
वो उजालों में अपनी परवाह खोजता है।

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