Ashish Awasthi   (ख़ाक)
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Joined 14 May 2017


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Joined 14 May 2017
20 JAN AT 22:34

सुनो यारों, मुझे भी
यार मेरा मिल ही जायेगा,

ख़ुदा जब क़ैस गढ़ता है
तो लैला भी बनाता है।।

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13 JAN AT 0:58

हो सज़ा तो भले छोड़ दो अब मुझे
जुर्म में पर सनम तुम मेरे साथ थे।।

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11 JAN AT 14:04

वस्ल की रात जगना समझ आता है
हिज्र में जागना पर ग़ज़ब बात है।।

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10 JAN AT 19:42

ख़ुद गरेबाँ में कभी झांके नहीं जो लोग वो
दो जहाँ की सीख हमको मुफ़्त में देकर गए।।

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1 JAN AT 10:45

धूप, बादल, छांव, पानी और ये साल- ए- जवां
सब तो हैं अब तुम भी आओ तो मुबारक हम कहें।।

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1 JAN AT 10:38

सुना है नया साल आया है फिर से
हमें हिज्र की याद ताज़ा कराने।।

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30 DEC 2020 AT 13:15

भूल सकता है भले दुश्मन पुराने ज़ख़्म को
दोस्त लेकिन बिन कुरेदे मानने वाले नहीं।।

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25 DEC 2020 AT 19:55

शेर कुछ ऐसे अभी लिखने को बाक़ी रह गए
पढ़ के जिनको दिल से खूँ की धार बाहर गिर पड़े।।

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21 DEC 2020 AT 17:48

मोहब्बत इस तरह से चल रही है आजकल मेरी
ग़लत कोई रहे लेकिन सज़ा मुझको ही होती है।।

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20 DEC 2020 AT 13:06

सबके ग़म में साथ रहे पर ख़ुद ग़म से डर जाते हैं
सबकी बातें सुनने वाले गुमसुम ही मर जाते हैं।।

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