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Ashish Awasthi (ख़ाक)

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Ashish Awasthi 2 FEB AT 17:21

देखना हो किस तरह सब छूटता पीछे है तो
ट्रेन की खिड़की से बाहर देख लेना चाहिए।।

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Ashish Awasthi 1 FEB AT 11:34

जला जला कर दिल को रोज़ मुहब्बत में
देखो कैसे ख़ुद को 'ख़ाक' बनाया हमने।।

(अनुशीर्षक में पढ़िए)

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Ashish Awasthi 30 JAN AT 22:20

क़दम थक रहे हैं भले ही सफ़र में
मगर इक जुनूँ भी चढ़ा तो है सर में

दिवारें हैं बूढ़ी टपकती है छत भी
मगर है सुकूँ यार अपने ही घर में

मिरे दिल को अपने ही दिल सा जो समझे
बताना अगर कोई हो तो नज़र में

जिसे देखिये जी रहा है ये पीकर
नहीं रह गयी बात अब वो ज़हर में

किसी और की तुम ग़ज़ल बन गयी क्यूँ
कमी रह गयी थी क्या मेरे हुनर में

उसे तुम न भूले से महताब कहना
नहीं दाग़ कोई मेरे हमसफ़र में

भरी धूप में तरबतर देख उसको
बहुत दर्द उठ्ठा है शाख-ए-शजर में

सुनो 'ख़ाक' जी लो हसीं शब में जी भर
न जाने क्या होना हो कल की सहर में।।

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Ashish Awasthi 30 JAN AT 11:47

इक ज़रा सी बात पर उस घर के पत्थर ने कहा
नींव की ईटों को थोड़ा दब के रहना चाहिए।।

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Ashish Awasthi 27 JAN AT 19:46

मर्ज़ ऐसा था परिंदे का कि मरना तय ही था
पर शजर की गोद में आया तो अच्छा हो गया।।

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Ashish Awasthi 25 JAN AT 2:08

जिस जगह से आपको कुछ इश्क़ सा होने लगे
उस जगह को जल्द ही फिर छोड़ देना चाहिए।।

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Ashish Awasthi 20 JAN AT 21:28

दिल, जिगर, जान सब कुछ ही खोते रहे
जो हमारा न था उसके होते रहे

लोग ख़ुश थे कि घर हो गया आसमाँ
और हम थे ज़मीं देख रोते रहे

शोर था ख़ूब हम जब मरे थे मगर
नींद थी उम्र भर की तो सोते रहे

आग पानी से बुझती है सुन करके ये
बारहा दिल को अश्क़ों से धोते रहे

छोड़ कर एक दो को जहाँ में सभी
मर के ख़ुद लाश को सर पे ढोते रहे

चारगर ने दवा में ज़हर दे दिया
नाख़ुदा कश्तियों को डुबोते रहे

ख़्वाब बुनने की उजलत थी हमको तो हम
रात सूई में नींदे पिरोते रहे।।

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Ashish Awasthi 20 JAN AT 0:22

ग़ज़ल
(अनुशीर्षक में पढ़िए)

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Ashish Awasthi 18 JAN AT 23:47

फलाँ बात को इस फलाँ ढंग से कह दो
फलाँ शख़्स से ये फलाँ कह रहा है।।

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Ashish Awasthi 15 JAN AT 14:33

हाथ गुल से औ बदन में रातरानी की महक
आपको लड़की नहीं इक बाग़ होना चाहिए।।

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