Ashish Awasthi   (ख़ाक)
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Joined 14 May 2017


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Ashish Awasthi 22 JUN AT 16:31

लम्स से तेरे पिघलती जा रही है रूह ये
बर्फ़ सा घुल कर मिलूँगा मैं तुम्हारे जिस्म में।।

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Ashish Awasthi 21 JUN AT 11:55

जब तक बाप के साये में था
तब तक मैं भी राजा था
अब बाप बना हूँ बच्चों का तो
शहज़ादे हैं बच्चे मेरे।।

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Ashish Awasthi 21 JUN AT 11:42

इक शजर की छाँव में कितने परिंदे पल गए
बाप के साये में आकर ग़म ख़ुशी में ढल गए।।

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Ashish Awasthi 20 JUN AT 8:59

कान्हा, मोहन, मुरलीधर
भी ख़ुद में आधे आधे हैं,
आधे तो नारायण हैं
औ बाक़ी राधे राधे हैं।।

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Ashish Awasthi 19 JUN AT 14:24

है यही मानी तुम्हारी बेक़रारी का सनम
वस्ल की ख़्वाहिश उठी है अब तुम्हारे जिस्म में।।

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Ashish Awasthi 18 JUN AT 1:18

नज़्म ज़ुल्फ़ों में लिखी है, शाइरी आँखों में है
औ ग़ज़ल के शेर लिक्खे हैं तुम्हारे जिस्म में।।

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Ashish Awasthi 17 JUN AT 22:57

सबसे आसान है किसी को बुरा कह देना।।

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Ashish Awasthi 15 JUN AT 20:11

एक हिरनी सी मचलती है तन-ए-शफ़्फ़ाफ़ में
कुछ हिरन भी आह भरते हैं तुम्हारे जिस्म में।।

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Ashish Awasthi 14 JUN AT 21:30

डूबते ज़ेहन के आगे ज़िन्दगी ही हारती है
आदमी को आदमी की ही उदासी मारती है।।

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Ashish Awasthi 14 JUN AT 19:08

फूल, डाली, बाग, सहरा, आग, पानी, गुलसिताँ
चाँद, तारे, रात रहते हैं तुम्हारे जिस्म में।।

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