Arif Alvi   (आरिफ़ अल्वी)
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Joined 5 February 2019


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AN HOUR AGO

होंठ उसके देख कर मैं गिर रहा हूँ हर तरफ़
इश्क़ करके इश्क़ से मैं घिर रहा हूँ हर तरफ़

होश खोया चैन खोया जबसे उसको दिल दिया
इक नशा सा साथ लेकर फिर रहा हूँ हर तरफ़

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YESTERDAY AT 16:37

कभी किसी से वफ़ा करूँ मैं
ये ख़ूबसूरत नशा करूँ मैं

मुझे नज़र में कभी बसाओ
तुम्हारे दिल में रहा करूँ मैं

तुझे जो देखा ख़ुदा को देखा
नमाज़ तेरी अदा करूँ मैं

मुझे नज़र से उतार देना
वफ़ा से जब भी दग़ा करूँ मैं

तेरा है 'आरिफ़' तेरा रहेगा
तुझे ही ख़ुद में भरा करूँ मैं

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24 SEP AT 11:22

इल्ज़ाम इश्क़ के सब आसान लग रहे हैं
जब से मिले हैं उनसे मेहमान लग रहे हैं

उनसे हुई मोहब्बत उनकी ही सोच में थे
ख़्वाबों में इश्क़ के कुछ इमकान लग रहे हैं

देखा है जब से उनको कुछ होश में नहीं हम
आशिक़ हुए हैं फिर भी नादान लग रहे हैं

इर्शाद क्या करें हम उस हुस्न की परी का
काँटे भी देख उनको गुलदान लग रहे हैं

इक रोज़ उनके 'आरिफ़' तुम ख़्वाब में तो आना
दिल की लगी से वो कुछ अंजान लग रहे हैं

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22 SEP AT 11:41

कुछ नशा कुछ वफ़ा ज़िन्दगी के लिए
इश्क़ भी चाहिए आशिक़ी के लिए

हाथ में हाथ हो कुछ नई बात हो
और क्या चाहिए बंदगी के लिए

नाम गुम हो गया जब कभी हम मिले
अब कहाँ प्यास है तिश्नगी के लिए

दर्द-ए-दिल ही मिला साँस भी रुक गई
इक नज़र देख लो अब ख़ुशी के लिए

मौत तक बस तुझे देखता ही रहूँ
जी लिया इस तरह हर किसी के लिए

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20 SEP AT 19:24

हर किसी को हर किसी का ग़म कहाँ
हर किसी के दिल में बसते हम कहाँ

रह सको तो रह ही लेना साथ तुम
इश्क़ में अब मुश्किलें ही कम कहाँ

इक वफ़ा के वास्ते हैं सब इधर
पर मोहब्बत में अभी वो दम कहाँ

जब ख़ुशी हो पास तो सब पास हैं
रोते-रोते आँख बहना नम कहाँ

कौन 'आरिफ़' से करेगा इश्क़ अब
हो सके इसका वो अब हमदम कहाँ

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18 SEP AT 19:09

रिश्तों का गिर गया है अब दाम बिकते-बिकते
हर कोई कर रहा है बदनाम बिकते-बिकते

चाहत नहीं है दिल में चेहरों पे झूठी ख़ुशियाँ
अब इश्क़ का बचा है बस नाम बिकते-बिकते

मुर्शिद बने हैं दुश्मन दिल पर चलाएँ ख़ंजर
लेते हैं अपना-अपना ये काम बिकते-बिकते

खुलकर बिकी मोहब्बत तिल-तिल गिराए आँसू
मिलता नहीं है फिर भी अंजाम बिकते-बिकते

तेरा नहीं है कोई कब तक चलेगा 'आरिफ़'
दुश्मन बनी ये सारी आवाम बिकते-बिकते

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17 SEP AT 20:08

मकरूह हो गया है इज़हार इश्क़ का अब
कैसे बनेगा 'आरिफ़' घर-बार इश्क़ का अब

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14 SEP AT 19:26

कुछ और दर्द दे दो इस बार ज़िन्दगी को
मिलती नहीं मोहब्बत अब यार ज़िन्दगी को

किससे करूँ शिकायत किस पर करूँ भरोसा
भाता नहीं है कोई घर बार ज़िन्दगी को

अपने हुए पराये उसका नहीं है शिकवा
अपनों से ही मिले हैं आज़ार ज़िन्दगी को

कल साथ थे हमारे हम पर फ़िदा था सब कुछ
अब वो दिखा रहे हैं किरदार ज़िन्दगी को

'आरिफ़' हुआ अकेला ख़ुद की ही जान से अब
करता रहेगा अब वो अख़बार ज़िन्दगी को

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27 AUG AT 17:16

ठोकर लगी है मुझको कुछ प्यार के लिए भी
कुछ इश्क़ खो दिया है इज़हार के लिए भी

गुल से मिली थी ख़ुशबू तब होश में था आया
बे-होश दिल है मेरा अब ख़ार के लिए भी

ख़ुशहाल ही तो हैं सब दुश्मन यहाँ हमारे
दिल से बनाओ रिश्ते फिर प्यार के लिए भी

कल जीत इश्क़ की हम मिलकर मना ही लेंगे
कर लें ज़रा सिफ़ारिश फिर हार के लिए भी

'आरिफ़' हुआ है मुर्शिद फिर आज दिलरुबा का
हँसता रहा है उसकी इक मार के लिए भी

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17 AUG AT 22:45

कुछ इश्क़ मुझको दे दो इनकार मत करो तुम
दिल मेरा टुकड़े-टुकड़े हर बार मत करो तुम

बस इश्क़ करते-करते मिलकर ही तो बने हम
इस दिल की ये इमारत मिस्मार मत करो तुम

कहता हो कुछ ज़माना हर हाल तुम निभाना
गुलज़ार है ये रिश्ता अख़बार मत करो तुम

जब चाहो पास आना जब चाहो दूर जाना
अब इश्क़ की हदों को फिर पार मत करो तुम

तुमसे बना है 'आरिफ़' उससे बना है रिश्ता
हम फूल इश्क़ के हैं अब ख़ार मत करो तुम

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