Aरिफ़ Aल्व़ी   (कोरा काग़ज़....✍ (Arif Alvi))
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Joined 5 February 2019


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बेवजह यहाँ लोगों का
कुछ पल का ही संग है शरीर और रोगों का

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तुम कहाँ खो गये इस दूरदर्शी दुनिया में
लोग यहाँ आवर्धक से गलतियाँ ढूँढते हैं

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कभी किसी ने ना सुनी सूखे पेड़ों की फरियाद
उनके ज़हन में है हरे पत्तों की धुंधली सी याद

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सच्चाई के सागर में जो चले उसकी नईया
बुराई के मंझधार में कभी न फंसे वो भईया

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हाथ की हथेलियों से मुझे
मेरी लकीरों में नहीं था फिर भी मिल गया तू मुझे

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मैं मरीज़-ए-मोहब्बत हो गया हूँ लगता है मुझे
निगाह-ए-यार जो मुझपर पड़ी कुछ देर पहले

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आओ तुम्हें दिन रात निहारूँ

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सुकून से जीने के लिए
अल्फाज़ों का क़रीना चाहिए इश्क़ के सफ़ीने के लिए

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दुआ माँगते चलो तुम सारे संसार की
फसल काट ही दो अब अहंकार की

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कुछ फासला है हाथ की सभी उंगलियों के बीच
मेरी उंगलियों से मिल जाओ ना उम्र भर के लिए

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