Arif Alvi   (आरिफ़ अल्वी)
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Joined 5 February 2019


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YESTERDAY AT 19:52

दर्द होगा सह लूँगा हँसते-हँसते
कुछ न कुछ तो कह लूँगा हँसते-हँसते

छोड़कर तुम जाओगे, जाओ-जाओ
बिन तुम्हारे रह लूँगा हँसते-हँसते

याद आई कल मुझको गर तुम्हारी
आँख भर कर बह लूँगा हँसते-हँसते

इश्क़ करके तुम मुझसे दूर जाना
कतरा-कतरा ढह लूँगा हँसते-हँसते

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25 OCT AT 20:51

उससे बिछड़े तो मिली ताज़ीर इश्क़ की
पता चल ही गई हमें भी जागीर इश्क़ की

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22 OCT AT 14:25

आज मेरी ज़िन्दगी को भा रहे हो सिर्फ़ तुम
रोज़ नग़में दिल में मेरे गा रहे हो सिर्फ़ तुम

याद सबको करके देखा चैन अब मिलता नहीं
ख़्वाब में भी मिलने मुझसे आ रहे हो सिर्फ़ तुम

दिल ये मेरा है चुराया जब से तेरे इश्क़ ने
जिस्म में भी अब तो मेरे छा रहे हो सिर्फ़ तुम

मैं तुम्हारा हो गया हूँ जब से दिल तुमको दिया
दिल ये मेरा तोड़कर बस जा रहे हो सिर्फ़ तुम

अब हक़ीक़त में तुम्हारा आज 'आरिफ़' हो गया
ज़ुल्म उस पर फिर भी कितने ढा रहे हो सिर्फ़ तुम

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10 OCT AT 12:38

हया में छुपी है मोहब्बत ज़रा सी
शराफ़त ज़रा सी शिकायत ज़रा सी

ये ज़ुल्फ़ें ये चेहरा ये शर्मीली आँखें
कभी तो गिरा दो क़यामत ज़रा सी

जो नज़रें झुका कर चलो तुम कहीं पर
तो दिल में भी होती शरारत ज़रा सी

हुआ हूँ दीवाना जो देखा है तुमको
कहो तुम तो कर लूँ बग़ावत ज़रा सी

नशे में है 'आरिफ़' जो की है मोहब्बत
तलब है तुम्हारी भी आदत ज़रा सी

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6 OCT AT 13:01

मिस्मार हो गया दिल बदनाम होते-होते
मर ही गई वफ़ा भी नाकाम होते-होते

रिश्वत की आशिक़ी है बाज़ार है दग़ा का
रिश्ते भी मिट गए अब बे-नाम होते-होते

कुछ और है दिलों में कुछ और ही है चेहरा
सब दफ़्न कर दिया है गुमनाम होते-होते

कुछ जिस्म जी रहे हैं कुछ जिस्म मर रहे हैं
नंगे हुए हैं कुछ गुल गुलफ़ाम होते-होते

लाचार है तू 'आरिफ़' कोई नहीं है तेरा
दुश्मन हुआ ज़माना आवाम होते-होते

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2 OCT AT 23:19

साथ दोगे हर तरह से तब चलो
इश्क़ लेकर साथ अपने सब चलो

ज़ख़्म दिल को मिल रहे हैं आज तक
दर्द में भी जी ही लूँगा अब चलो

इक इबादत इश्क़ को भी कह लिया
पर मोहब्बत से मिलेगा रब चलो

चलते-चलते भूल मुझको तुम गए
होश तुमको आएगा फिर कब चलो

आज 'आरिफ़' मिल गया है बेझिझक
बोल देना साथ उसके जब चलो

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1 OCT AT 13:32

फ़लक पर ख़ुशी के सितारे नहीं अब
जो चमके थे पहले हमारे नहीं अब

है आँखों में मेरे भी इश्क़-ए-समंदर
मोहब्बत को फिर भी किनारे नहीं अब

ख़ुदा ने क़यामत सा तुमको बनाया
करें क्या रहे हम तुम्हारे नहीं अब

मैं महका था उस दिन जो देखा था तुमको
क्या आँखों में वैसे नज़ारे नहीं अब

मैं तन्हा नहीं हूँ हुआ हूँ मुसाफ़िर
वफ़ा के ये रस्ते भी प्यारे नहीं अब

कभी तो कहो तुम की 'आरिफ़' तुम्हारा
कि मिलते हैं तुमसे सहारे नहीं अब

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27 SEP AT 20:52

होंठ उसके देख कर मैं गिर रहा हूँ हर तरफ़
इश्क़ करके इश्क़ से मैं घिर रहा हूँ हर तरफ़

होश खोया चैन खोया जबसे उसको दिल दिया
इक नशा सा साथ लेकर फिर रहा हूँ हर तरफ़

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26 SEP AT 16:37

कभी किसी से वफ़ा करूँ मैं
ये ख़ूबसूरत नशा करूँ मैं

मुझे नज़र में कभी बसाओ
तुम्हारे दिल में रहा करूँ मैं

तुझे जो देखा ख़ुदा को देखा
नमाज़ तेरी अदा करूँ मैं

मुझे नज़र से उतार देना
वफ़ा से जब भी दग़ा करूँ मैं

तेरा है 'आरिफ़' तेरा रहेगा
तुझे ही ख़ुद में भरा करूँ मैं

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24 SEP AT 11:22

इल्ज़ाम इश्क़ के सब आसान लग रहे हैं
जब से मिले हैं उनसे मेहमान लग रहे हैं

उनसे हुई मोहब्बत उनकी ही सोच में थे
ख़्वाबों में इश्क़ के कुछ इमकान लग रहे हैं

देखा है जब से उनको कुछ होश में नहीं हम
आशिक़ हुए हैं फिर भी नादान लग रहे हैं

इर्शाद क्या करें हम उस हुस्न की परी का
काँटे भी देख उनको गुलदान लग रहे हैं

इक रोज़ उनके 'आरिफ़' तुम ख़्वाब में तो आना
दिल की लगी से वो कुछ अंजान लग रहे हैं

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