Anupma Tripathi   (©अनुपमा विन्ध्यवासिनी)
383 Followers · 14 Following

read more
Joined 28 December 2017


read more
Joined 28 December 2017
Anupma Tripathi AN HOUR AGO

शीत ऋतु ( भाग २)

बात चांदनी की सुनकर फ़िर हुई अचंभित नदी की धारा-
"शीत ऋतु में ही तुहिनों को क्यों देखे है यह जग सारा ?"
समाधान ढूँढा तुहिनों ने; धारा के प्रश्नों का; मन से
संशय किया दूर ; शीत के ; समुचित और सौम्य वर्णन से!
सुन तरंगिणी! शीत ऋतु ; प्रकृति की शीतल माला है
ग्रीष्मोपरान्त ; शीत हेतु जिसे प्रकृति ने कंठ में धारा है
प्रतिपल प्रकृति इस माला को नव्य रंगों से सजाती है
कभी बर्फ़, कभी बदली, कभी सुरम्य मधुराका बनाती है !

(शेष, अगले भाग में)

- ©अनुपमा विन्ध्यवासिनी


-


Show more
11 likes · 1 comments
Anupma Tripathi YESTERDAY AT 18:06

"शीत ऋतु "- (भाग १)

सौम्य पवन ने देखकर भरी आह; अभिराम यामिनी,
बोली; उड़ते तुहिन कणों से; कैसी चमके व्योम-दामिनी !
दोनों के संवाद को सुनकर; निकली छिपी हुई मधुराका
बोली; चंचल पवन! तुम्हें आती है क्या तुहिनों की भाषा?

( शेष कविता; अगले भागों में )

-


14 likes · 1 comments
Anupma Tripathi YESTERDAY AT 16:05

कहने से नहीं होगा सपना कोई पूरा,
सपनों की राहों पर चलना भी ज़रूरी है !
आसान बहुत ही है मंज़िल को तय करना,
मंज़िल तक जाने को बढ़ना भी ज़रूरी है !

-


Show more
22 likes
Anupma Tripathi YESTERDAY AT 15:43

हृदय बहुत ही बोझिल होगा बांध तोड़ती नदियों का
पर्वत भी मौन खड़े रहकर उर में करते होंगे रूदन
विकल पवन भी होती होगी तब आती होगी आंधी
जब गगन बिलखता होगा तब घिरता होगा सावन

-


15 likes · 2 comments
Anupma Tripathi YESTERDAY AT 11:11

आज सुबह उदास है, रोज़ की तरह ! उदास है सुबह क्योंकि अब कुछ भी वैसा नहीं है जैसा उसे पसंद था...
अब सूरज की नारंगी किरणें वैसी नारंगी नहीं रह गयी हैं जो सुबह को भाती थीं....उससे बातें करने के लिए परिंदे अब आसमान की ओर कम ही उड़ते हैं....कितने दिनों से सुबह ने ख़ुद को पुकारने वाली, मुर्गे की बाँग, नहीं सुनी ! सुबह की उदासी कंक्रीट के जंगलों पर फैली हुई है.... अब वो हरे पेड़ों के झुरमुट नहीं दिखते जिनकी फुनगियों पर बैठ कर सुबह, कोयल का संगीत सुनती थी! अब सुबह को ज़मीन पर आना अच्छा नहीं लगता ! फ़िर भी सुबह आती है हर रोज़ , वैसे ही जैसे लोग जीते रहते हैं ज़िन्दगी को,एक ही नीरस ढर्रे पर, हर रोज़.....

-


16 likes · 3 comments
Anupma Tripathi YESTERDAY AT 23:33

रंग और रोशनी.....ये जितने धरती के पास हैं, उतने आसमान के पास भी हैं ! आसमान का दिन रंगों से भरा होता है और रात रोशनी से भरी लेकिन.....हमेशा ऐसा नहीं होता ! बहुत बार आसमान के लाल-गुलाबी रंग बादलों में खो जाते हैं..... बहुत बार धूप के सुनहरे रंग की जगह, बारिश के मद्धिम रंग ले लेते हैं..... कई बार रात की रोशनी चाँद की अमावस में खो जाती हैं या तारों के सारे दिये बादलों के पीछे कहीं छिप जाते हैं ! फ़िर भी,आसमान को बारिश के बाद उसके रंग वापस मिलते हैं.... अमावस के बाद चांदनी फ़िर से खिलती है और रात के आंगन में तारों के दिये फ़िर से जगमगाते हैं.....और तब क्या वो रोशनी और रंग ज़्यादा ख़ूबसूरत नहीं हो जाते हैं ?

-


14 likes · 1 comments
Anupma Tripathi 19 AUG AT 19:30

पहले से बने हुए रास्तों पर चलना ; कोई बड़ी बात नहीं !
बिल्कुल ही नए रास्तों को गढ़ना ; क्या बड़ी बात नहीं ?

-


20 likes · 1 comments
Anupma Tripathi 18 AUG AT 22:32

बड़े सपने देखना और
बड़े सपनों को हक़ीक़त में बदलना,
दो बिल्कुल अलग बातें हैं !

-


15 likes
Anupma Tripathi 14 AUG AT 23:34

तारों जैसी ; टिमटिम करतीं
चमकीली हैं, चांद की बातें !
रात की कोई सरगम लगतीं
चमकीली सी, चांद की बातें !

और हवाओं के आंगन में
फिरती रहतीं, चांद की बातें !
मेरे मन की ख़ामोशी से
बातें करतीं, चांद की बातें !

-


15 likes · 1 comments
Anupma Tripathi 14 AUG AT 19:02

पक्षी बंधनमुक्त नहीं होते, वे बंधे होतें हैं अपने घोंसलों से.....
नदियाँ भी बंधनमुक्त नहीं होतीं, वे बंधी होतीं हैं अपने किनारों से....
वृक्ष भी बंधनमुक्त नहीं होते, वे बंधे होतें हैं अपनी जड़ों से....
फ़िर भी, प्रकृति में सबकुछ अपने-अपने बंधनों के साथ स्वतंत्र है.....
स्वतंत्रता का अर्थ सभी बंधन तोड़ देना नहीं है,
स्वतंत्रता का अर्थ है - उन बंधनों को खत्म करना जो बेवजह हैं, बेमतलब हैं और उन बंधनों को समझना जो अस्तित्व को और भी ज़्यादा बेहतर बनाते हैं.....
स्वतंत्रता का अर्थ बंधनों से मुक्ति नहीं है, स्वतंत्रता की सार्थकता उन बंधनों के साथ है जो हृदय को मुक्त करते हैं और जीवन को विस्तार देते हैं.....

-


19 likes · 2 comments

Fetching Anupma Tripathi Quotes

YQ_Launcher Write your own quotes on YourQuote app
Open App