Anupma Tripathi   (©अनुपमा विन्ध्यवासिनी)
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Joined 28 December 2017


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Joined 28 December 2017
Anupma Tripathi 2 DEC AT 20:20

एक अकेला जीवन साक्षी कितनी ही यात्राओं का
कहीं नहीं कोई पड़ाव, हर ओर यहाँ बस राह ही है !

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Anupma Tripathi 1 DEC AT 18:56

ज़रा सी रोशनी
ज़रा सा आसमाँ,
बनाने को सुबह
और क्या चाहिए ?

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Anupma Tripathi 1 DEC AT 0:22

अनुभव करें तो समझेंगे कि ;
बहता है जीवन,
फूलों के चटकीले रंगों में.....
बारिश की फुहार में.....
चांद की चुप्पी में.....
धूप की बातों में.....
हवाओं की बेफ़िक्री में.....
सन्नाटे की सादगी में.....
और
बेवजह ; यूँ ही फूट पड़ी खिलखिलाहट में.....



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Anupma Tripathi 30 NOV AT 20:41

"नयापन
किसी एक तारीख में नहीं
हर उस दिन में है
जिसमें,
सुबह की धूप
भरोसा देती सी दिखाई दे,
आस-पास का सारा शोर
मन के भीतर
एक गहरे सुकून में बदल जाए,
भीड़ की अजनबी नज़रों के बीच
आँखें फ़िर भी चमकती रहें....."

( पूरी कविता, caption में )

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Anupma Tripathi 30 NOV AT 20:10

नारंगी रंगोली के रंग
क्षितिज-धरा पर बिखर गये हैं,
फ़िर सागर में धूप घुल गई,
फ़िर धरती पर आई शाम !
घने कुहासे जैसा मौसम,
सन्नाटों से भरा हुआ है,
चुपके से ख़ामोश गगन पर
धीरे- धीरे छायी शाम !

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Anupma Tripathi 29 NOV AT 15:31

पिंजरे का पंछी है जो मन,कब ऊँचा उड़ पाता है ?
मन ; जो काँच सरीखा,टूटे, मुश्किल से जुड़ पाता है।

पलकों तक आने की राहें आँसू भी बिसरा जाते ,
जिसकी जितनी पीर हो गहरी वो उतना मुस्काता है।

साँझ ढले जब, दिन उगता है, तभी उजाला होता है
अपनी मुट्ठी में कोई कब धूप कैद कर पाता है ?

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Anupma Tripathi 27 NOV AT 18:21

चलो अब ढूँढकर फ़िर कुछ उम्मीदें
चाँद के चाँदी जैसे रास्तों पर
सुनहरी रोशनी की सरहदों पर
चमकती किरकिरी सा फ़िर बिखेरें.....
देखना, फ़िर चाँद होगा ज़्यादा रोशन,
रोशनी उम्मीदों की राहें बुनेगी !

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Anupma Tripathi 25 NOV AT 12:04

फ़क़त उसकी ही मुट्ठी में ये ज़माना होगा 
फ़लसफ़ा ज़िंदगी जीने का जिसने जाना होगा

ख़्वाहिशें चाँद सी रखने से भला क्या होगा 
कोई च़िराग ज़मीं पर भी जलाना होगा 

हाल पूछेंगे हारने पर कुछ लोग मगर 
जीत का हौसला फिर ख़ुद ही जुटाना होगा

शोर इतना है यहाँ खोखले जज़्बात का
ख़ुद को अब अपना-पराया भी बताना होगा 

ज़रूरी तो नहीं हर बार दिया जाए जवाब 
बात कड़वी भी अगर हो, मुस्कुराना होगा

- ©अनुपमा विन्ध्यवासिनी

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Anupma Tripathi 24 NOV AT 21:54

सफ़र कितना भी हो लम्बा मग़र सफ़र ही तो है
दिखाई दूर तक देती है पर डगर ही तो है

फ़कत मंज़िल के लिए राहें कितना भटकी हैं
भटक जाना भी रास्तों का हुनर ही तो है

कौन कहता है क्या, इस बात पर क्यों गौर करें
है बातों से बहुत ही खोखला, शहर ही तो है

दिखा देती है आईना बहुत ख़ामोशी से
बड़ी सादी सी दिखती है, कोई गज़ल ही तो है

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Anupma Tripathi 23 NOV AT 15:43

यहाँ से वहाँ तक खिंची है उदासी
जहाँ तक भी देखो बसी है उदासी
बहुत रोज़ कमियाँ गिनाईं गईं हैं
जिन्हें सुनते-सुनते बढ़ी है उदासी
किसी की भला क्या ये दुश्मन बनेगी
जब अपने से ही अजनबी है उदासी
भरोसा दिखाया है जब भी किसी ने
समझ ख़ुद को काबिल हंसी है उदासी

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