Amit Kumar   (अमित 'अनुरागी'✍)
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Joined 19 June 2017


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Joined 19 June 2017
Amit Kumar 5 MAY AT 10:15

मिलकर रूख़ों की शाख़ से कुल्हाड़ियाँ,
काट देतीं हैं सारी जमात दरख्तों की।

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घर का भेदी लंका ढाए।।

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Amit Kumar 22 APR AT 8:34

भोग छप्पन लगाये तेरही में उसकी,
मरा था जो शख़्स भूख से तड़पकर।

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Amit Kumar 20 APR AT 9:42

इक नयी बला को सर लिया है।
कि इश्क़ मैंने फिर कर लिया है।

लाज़िम है चाँद बड़ी जोर से जलना,
मैंने बाहों में उसको फिर भर लिया है।

जायेगा दूर किस हद तक वो मुझसे,
मैंने उसके ही शहर में घर लिया है।

जिद है कि इश्क़ में जीना है मुझको,
कि मोहब्बत में हर रोज मर लिया है।

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Amit Kumar 14 APR AT 11:23

और कितना आजमाओगे दोस्त?
मुझे गले नहीं लगाओगे दोस्त?

तेरी चौखट से लौटा हूँ कितनी दफ़ा,
मुझे अंदर नहीं बुलाओगे दोस्त?

ख़ैरियत मेरी ही पूछ रहे हो कब से,
कुछ अपनी नहीं सुनाओगे दोस्त?

मुलाकात से हमारी मुझे याद आया,
आज चाय नहीं पिलाओगे दोस्त?

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Amit Kumar 12 APR AT 20:35

उसकी गली से जब भी गुजर जाता हूँ।
पलटकर देखता हूँ और ठहर जाता हूँ।

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Amit Kumar 9 APR AT 9:19

ये दरिया-ए-इश्क़ है साहब।
जितना डूबोगे, उतना ऊपर जाओगे।

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Amit Kumar 8 APR AT 17:57

हाल क्या कहें कि दिल पर क्या गुजरती है।
वो सज-संवरकर जब क़रीब से निकलती है।

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Amit Kumar 2 APR AT 10:10

लो हमने भी सीख लिया सलीक़ा झूठ का।
लो हम भी अजीज होंगे अब सारे शहर के।

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Amit Kumar 1 APR AT 7:50

दफ़न करके उस गाँव में अपना वजूद।
ओढ़ लिये हमने भी शहर ख्वाहिशों के।

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Amit Kumar 31 MAR AT 19:01

उसकी बातों में सच नहीं होता।
मिरा दोस्त भी 'अख़बार' जैसा है।

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