Amit Kumar   (अमित 'अनुरागी'✍)
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शायर हूँ ज़नाब,
शब्दों में जान फूँकता हूँ।
NIT-BHOPAL
10 DEC.🎂🎂
Joined 19 June 2017


शायर हूँ ज़नाब,
शब्दों में जान फूँकता हूँ।
NIT-BHOPAL
10 DEC.🎂🎂
Joined 19 June 2017
Amit Kumar 30 DEC 2019 AT 20:16

खो जातीं हैं नदियाँ समंदर से मिलकर।
लाज़िम है के 'दोस्त' बराबर के हों।

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Amit Kumar 24 NOV 2019 AT 18:52

एक शख़्स बनाता है दीवारों में घर।
कुछ औलाद बना देतीं हैं घरों में दीवारें।

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Amit Kumar 26 SEP 2019 AT 11:31

ये जो काला चश्मा लगाया गया है।
कौन है जिस पर सितम ढाया गया है।

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Amit Kumar 5 SEP 2019 AT 15:11

चेहरों को पढ़ने का हुनर रखिये।
सारे शहर की ख़बर रखिये।

कब किसके खून में आ मिले मक्कारी।
दोस्तों पर भी नज़र रखिये।

आवाज में गुरुर, निगाहों में गुमान।
भले ही थोड़ा सा मग़र रखिये।

सफ़र ख़त्म होने का इल्म नहीं होता।
साथ अपने हमसफ़र रखिये।

मंजिल आ गले मिलती है इक रोज।
बशर्ते थोड़ा सबर रखिये।

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Amit Kumar 7 JUL 2019 AT 14:07

मत पूछ के आईनों पर क्या गुजरती होगी।
तू बैठकर सामने जब सज-संवरती होगी।

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Amit Kumar 27 JUN 2019 AT 17:48

एक घर था जहाँ चैन-ओ-सुकून था।
एक मकान है जहाँ नींद नहीं है।

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Amit Kumar 23 JUN 2019 AT 8:31

पानी सा मिज़ाज है।
दिल दूध जैसा साफ़ है।

बातों में शुगर की मिठास है।
आँखों में नमकीनी अंदाज है।

चेहरे पर अदरक सा तेवर है।
हँसी में इलायची का फ्लेवर है।

उफ़्फ़्फ़, ये अदा कहाँ से लाये हो तुम।
ज़रूर कुल्हड़ वाली चाय हो तुम।

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Amit Kumar 14 JUN 2019 AT 19:36

सच कहने में आख़िर मज़ा क्या है?
हम जानते हैं झूठ की सज़ा क्या है?

मुफ़लिसी में अदालतों के फ़लसफ़े।
तुम्हें क्या बतलायें के क़ज़ा क्या है?

ख़्वाब तो जला दिये पहले ही मुंसिफ़।
अब पूछते हो आख़िरी रज़ा क्या है?

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Amit Kumar 9 JUN 2019 AT 21:16

भार उठता नहीं अपने 'किरदार' का हमसे।
कितना बोझ लेकर चलतीं होगीं "किताबें"।

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Amit Kumar 3 JUN 2019 AT 14:51

सब ढूँढ़ते रहे चाँद आसमान की जानिब।
हम देखते रहे रात भर सूरत-ए-यार की।

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