Abhishek G. Ghosh 🥇   (अभिषेक कलकत्तावाले)
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Joined 18 March 2019


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Joined 18 March 2019
Abhishek G. Ghosh 🥇 15 MINUTES AGO

मुद्दतों से तफ़क्कुर ये थी,
के दिलों के सराब में मुझे
क़मर-ए-मुराद मिल जाए।
सुबह आखें खुली तो
इत्तेफ़ाक से सामने तु थी।

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Abhishek G. Ghosh 🥇 49 MINUTES AGO

हमने माना कि तु ख़ूबसूरत है,
महताब में चमकती नूर-ए-फिरदौस है।
परवाने वहशत में है की ख़िज़ा में
ज़िबा-ए-बाहार की तरह
कहीं तुझे भी नज़र ना लग जाए।
बस मैं शांत हूँ, क्यूँकि तु मेरे दिल में है।

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चलो फिर कॉफ़ी हाउस रहने दो,
चौक में टी जंक्शन पे मिलते है।

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उस के साथ बैठने से 'अभिषेक'
मोम की तरह पिघल जाता हूँ।
अब तु ही बता मैं क्या करूँ,
साथ रहू या साथ छोर दूँ।

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उसके छूँ लेने से दर्द होता है,
ना जाने छोर कर जाने से क्या होगा।
उफ़्फ़्फ
मैं मर जवाँ...

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वो लोग ख़ुशनसीब है,
जिनके तु क़रीब है।

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पी लिया घूँट मुहब्बत का, सेंक लिया रोटी इश्क़ का।
तु कल भी मेरी नहि थी, तु आज भी मेरी नहि है।

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मजबूर हूँ मैं तिरी ख़ामोशी से,
कमज़ोर हु मैं तिरी रूठी नज़रों से।
कभी ख़्वाब में तो हंस लिया कर,
मेरी तरफ़ एक नज़र डाल दिया कर।

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है कहाँ मेरा जहाँ,
किसिको ख़बर नहीं।
क्या करूँ तिरी ज़िंदगी में
अब मेरा क़दर नहीं।

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एक धुँधली सी याद
काफ़ी है जीने के लिए।
भरोसा नहीं तो कभी
मुझे याद करके तो देखो।

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