Abhilekh   (©Abhilekh)
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Author:
"Baaki Baatein",
"चार अधूरी बातें,
"ख़यालों का अभिलेख"

Insta@kabhilekhak
Joined 6 November 2016


Author:
"Baaki Baatein",
"चार अधूरी बातें,
"ख़यालों का अभिलेख"

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Joined 6 November 2016
Abhilekh 23 HOURS AGO

Imaginary बातें... 8

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Abhilekh 31 MAR AT 18:34

लौट आना, लौटना नहीं होता...
वो तो अनचाहा सफर होता है।

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Abhilekh 27 MAR AT 15:03

जब सब कुछ बिखरने लगे तो समझ लेना,
कि तन्हाई को जीने का वक़्त आ गया है।

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Abhilekh 21 MAR AT 16:20

कुछ सवालों के जवाब
अंतराल के बाद आते हैं।

ताकि...
खामोशियों का वजूद बना रहे।

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Abhilekh 10 JAN AT 7:53

हर आग को चाहिए एक हवा...
लेफ्ट से आये,
राइट से आये,
या आपके फूंक से आये...
इन हवाओं को भी पता है,
कि जला के कुछ भला ही होगा,
कुछ उससे ख़ुद को सेकेंगे...
कुछ उसमें भुट्टे पकाएंगे...
लकड़ियां लगा के उसे उकसायेंगे,
और राख होने तक,
उसके इर्द-गिर्द खेल खेलेंगे...
राख के ठंडे होने पर,
सब निकल लेंगे अपने रास्ते,
और रह जायेगी अकेली राख...
जो कहीं किसी जूठे बर्तन को,
धोने के लिए भी नहीं काम आएगी।

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Abhilekh 5 JAN AT 15:07

माथे का पसीना आ गया है ललाट पर,
और संग बहा लाया सिंदूर...
जो ललाट पर आकर टिक गया,
और सूखने के बाद...
किसी टीके-सा हो गया है।

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Abhilekh 3 JAN AT 20:56

अपने में बदलाव के मुकाबले दूसरों में बदलाव को आंकना अक्सर आसान लगता है।

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Abhilekh 27 DEC 2019 AT 10:19

कितना कुछ कहना होता है तुमसे...


बाकी कैप्शन में 👇

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Abhilekh 18 DEC 2019 AT 21:33

आज तुम्हारे हर पोर को जिया है मैंने,
बिना छुए, बिना चूमे।

नल के नीचे जो तुम्हारी अंजुली थी,
पानियों से भीगी जो तुम्हारी उंगली थी,
उन पानियों को पिया है मैंने...
जो हथेली से सरक कर,
तुम्हारे कोहनी से टपक रही थी,
तुम्हे छू कर कहीं और बहक रही थी,
मैन हलक में उतार कर जिया है तुम्हें...
तुम्हारे जूठे पानी को,
होठों को छू कर बहते एहसासों को,
तुम्हारे हर पोर को छूते उन बूंदों को,
ज़ाया नहीं किया है मैने।

आज, बिना छुए, बिना चूमे...
मैंने फिर से चुम लिया है तुम्हें।

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Abhilekh 14 DEC 2019 AT 20:26

तुम्हारे लिए इतना कुछ लिख देना चाहता हूँ कि कचरे बिनने वाले भी जब कोई कागज़ का टुकड़ा उठाएं, तो उसमें भी तुम्हारा ज़िक्र दिखे।

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