Yq गुड़िया 👩   (Yq♥गुड़िया 👩)
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Joined 2 October 2017


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Joined 2 October 2017

बदल गया है ज़माना तो बदल जाने दो
जिन्हें कमाना है सिर्फ़ दौलत उन्हें कमाने दो।
मुझे अपना नहीं अपनों का ख़्याल रखना है
जो मरते हैं झूठी शान पे मर जाने दो।।

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भाषा में ढेर सारी शैलीयां
कइअलंकार विराम, कौमा,पुणॅविराम।
ना जाने कितने आरोह अवरोह
वयक्तितव सज गया हिन्दी से।
ललाट मा का बिन्दी से।
हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाये।।

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मैं ख़ुशनसीब हूँ मुझे आका से "सर" मिले ।
मुफ़लिस को जैसे कोई रहने को घर मिले ।।
जिनकी बदौलत आपका जीता है मैंने दिल ।
महफ़िल-ए-अदब से कुछ ऐसे हुनर मिले ।।
वीरान जंगलों ने कहा मुझे भूल न जाना ।
पहुँचो बस्तियों में जब तुमको शहर मिले ।।
शायद यही लिखा था तक़दीर में मेरी ।
तू तो न मिल सका तेरे दीवारो- दर मिले ।।
अब माँगने को कुछ नहीं सब है मेरे पास ।
मुझको दुआयें हौसले भी इस क़दर मिले ।।

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नमाज़ों में माँगूं शिवालयों में माँगू़ं ।
अँधेरे में माँगूं उजालों में माँगूं ।।
जवाबों में माँगूं सवालों में माँगूं ।
तुझे मैं तो रब से ख़्यालों में माँगूं ।।
वो जो रौशनी के मुक़ाबिल खड़े हैं ।
बेकार ज़िद पर वो अपनी अड़े हैं ।।
चाँद सूरज से मत करो जिरह तुम ।
मेरी मानो बहुत उनके रुतबे बड़े हैं ।।
जियालों में माँगूं हिलालों में माँगूं ।
बा-अदब तुम्हें मैं कमालों में माँगूँ ।।
लड़ना झगड़ना न आए अकड़ना ।
सरे-तसलीम ख़म कर नालों में माँगूं ।।

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एक लडकी के गहरे विक्षोभ से पैदा
शब्द भूचाल ला देंगें,
अभी हवाओं में भंवर हैं,
लिख रहा है ईश्वर एक-एक कहानी,
गुणात्मक होंगें हृदय के दुख
नहा जायेंगें अपने ही पापों से पापी
किसीके के घरोंदे को तोड़ ठीक नहीं किया
घौंसला उस चिड़िया का जो मराठी
वृक्षों के उपवन का मान बढ़ा रही थी
'मराठी कर्मभूमि'से हटा कौन सा
मान कौनसा इनाम मिल रहा?

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मुफ़लिसी है ,निर्धनता है , दरिद्रता है , नादारी है ।
ये कौन सा शहर है "गुड़िया" कैसी ये मारा मारी है ।।

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शब्द भी हैं अपशब्द भी हैं
चुनाव आपको करना है ।
दुख देना है किसी को या फ़िर
ख़ुशी से दामन भरना है ।।

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कुछ ख़ुशियाँ तो कुछ ग़म ।
जी लेंगे अब ऐसे ही हम ।।
वादा रहा मायूस न होंगे ।
न होंगी आँखें मेरी नम ।।

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भटकते रास्ते है फ़िर भी कोई ग़म नहीं ।
मुसीबत से जो घबराये उनमें से हम नहीं ।।
पुरख़तर राहों पे भी हमने चलना सीखा है ।
चेहरे पर है खुशियाँ देखो आँख नम नहीं ।।
हौसलों से ही तो मिलती हैं हमको मंज़िलें ।
रोके जो कोई रास्ता ये किसी में दम नहीं ।।
हैं सबकी दुआयें साथ में माँ का आशीर्वाद ।
कौन कहता है कि मुझपर कोई करम नहीं ।।

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सफ़लता से मेरी क्यों इस तरह जले जाते हैं ,
कुछ कह नहीं सकते बस हाथ मले जाते हैं ।
ये कह दे कोई उनसे यूँ नाहक मत परेशां हो ,
ज़रूरत नहीं है जाने की हम ही चले जाते हैं ।।

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