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#जिद न करो ।।

यूँ जहन्नुम तलक-ज़ीस्त उलझी पड़ी है ,
अब हसीं पल के इंतजाम की ज़िद न करो ।
जानता हूँ , तुझ बिन मसर्रत नहीं हैं घड़ियाँ ,
पर फिर से वो शाम लाने की जिद न करो ।।

न करो इबादतों का दौर फिर से शुरू,
फिर से अपना सबकुछ हार जाने की जिद न करो।
इसी सिलसिले में हुए हैं बर्बाद इस क़दर ,
बेहिसाब गहरा दरिया पार करने की जिद न करो ।।


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जीस्त-जिंदगी । मसर्रत-खुश । 
शब्-ए-तीरगी-अँधेरी रात ।
ज़िया-उजाला ।
ज़रर-घाव । जाबित -कठोर ।
निर्ज़-बंजर । बे-तासीर-व्यर्थ ।
मोजज़ा-जादू । तबस्सुम-मुस्काना ।
इस्बात-प्रमाण,तथ्य ।आश्ना-अपना ।

#APSPoems ©wolamhe
#shayaraps

एक ग़ज़ल । #जिद न करो ।। यूँ जहन्नुम तलक-ज़ीस्त उलझी पड़ी है , अब हसीं पल के इंतजाम की ज़िद न करो । जानता हूँ , तुझ बिन मसर्रत नहीं हैं घड़ियाँ , पर फिर से वो शाम लाने की जिद न करो ।। न करो इबादतों का दौर फिर से शुरू, फिर से अपना सबकुछ हार जाने की जिद न करो। इसी सिलसिले में हुए हैं बर्बाद इस क़दर , बेहिसाब गहरा दरिया पार करने की जिद न करो ।। मुहब्बत भी शब्-ए-तीरगी है सनम , इस तमी में ज़िया लाने की जिद न करो । इश्क़ तो अब भी बेहिसाब है तुमसे, पर फिर से मीठे ज़रर की जिद न करो।। ये ज़माना बड़ा जाबित है निर्ज़-जमीं की तरह , अब बे-तासीर मुहब्बत-ए-बरसात की जिद न करो । यूँ बिखरकर खुद को समेटना , मोजज़ा तो नही , चलो तो, सब्रोकरार की जिद न करो ।। तेरे तबस्सुम से गुलशन हुआ करता था घराना, फ़क़त दर्द में मुस्काने की जिद न करो । जला दिए हैं हमने ख़त जो तेरे इस्बात थे , उस ख़ाक को भी समेटने की ज़िद न करो ।। मानो सनम, उस उलझी शाम को पाने की जिद न करो , जो न है आश्ना, उसे फिर से लाने की जिद न करो । इश्क़ के समंदर में यूँ तूफ़ाँ बहुत आते हैं, उसके साहिल पे मकां बनाने की ज़िद न करो ।। ** जीस्त-जिंदगी । मसर्रत-खुश । शब्-ए-तीरगी-अँधेरी रात । ज़िया-उजाला । ज़रर-घाव । जाबित -कठोर । निर्ज़-बंजर । बे-तासीर-व्यर्थ । मोजज़ा-जादू । तबस्सुम-मुस्काना । इस्बात-प्रमाण,तथ्य ।आश्ना-अपना । #APSPoems ©wolamhe #shayaraps #yourquote #ghazal #lyrics #shayar #kavita

15 HOURS AGO