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सुना है कि कोई जोगी,
वहाँ अब भी भटकता है,
अपनी सूनी सी आंखे लिए,
सारी-सारी रात,
आकाश को तकता है,
इस उम्मीद में कि,
उसके हिस्से में भी,
थोड़ी सी धूप आ जाये,
उसे भी अंधरे में,
जरा सी रोशनी दिख जाये,
और उसके जिस्म को भी,
थोड़ी सी गर्माहट मिल जाये।

क्या तुम्हें याद है? हमारी पहली मुलाकात, हाँ, होगी क्यों नहीं, पहली मुलाकात, कौन भूल सकता है भला? याद आता है कि, सर्दियों की एक सुबह , बादलों के पीछे छिपे सूरज को, मैं बस इसलिए ताक रहा था, ताकि मेरे हिस्से में, थोड़ी धूप आ जाये, उस कोहरे में मुझे, थोड़ी रोशनी दिख जाये, और मेरे जिस्म को, जरा सी गर्माहट मिल जाये। मुझ तक धूप तो नहीं आयी, लेकिन अपने इर्द-गिर्द, धुंध को लपेटे हुए, उस दिन तुम जरूर आयी। मुझे रोशनी तो नहीं दिखी, लेकिन तुम्हारी मौजूदगी में, मुझे हर चेहरा, साफ-साफ नजर आया। मुझे गर्माहट तो नहीं मिली, लेकिन तुम्हारे हाथ का, मेरे हाथ को थामने भर से, मेरे जिस्म ने कंपकपना बन्द कर दिया। ऐसी ठंडी सुबह में, एक लंबी दूरी तय कर, जब कोई तुमसे मिलने को आये, और सिर्फ तुम्हारे लिए आये, क्योंकि वो भी तुमसे मिलना चाहती है, तब खुशी से भर जाना, स्वाभाविक होता हैं,और शायद इसीलिए मैं भी खुश था। नदी के उस पार जाने को, नाव पर सवार हम-तुम,जब पानी में आकाश को खोज रहे थे। और एक-दूसरे के अक्स को, हम लहरों के साथ, परस्पर मिलते हुए देख रहे थे। तब मैंने तुम्हें भी, बिल्कुल अपनी ही तरह , खुश होते हुए देखा था। नाव में एकसाथ, बैठे हुए हम दोनों, और दोनों ही चुप से थे। तुम चुप थी, लेकिन प्रवासी पंछियों के, उड़ते हुए झुंड का पीछा करती, तुम्हारी नजरों ने बहुत कुछ कहा था। कि तुम भी उड़ना चाहती हो, इस खुले आकाश में, और खो जाना चाहती हो, अपनी मुक्तता में। और तुम जो ठीक मेरे सामने, और इतना नजदीक थी, कि तुम्हें देखते हुए , मैं भी चुप ही रहा। मुझे याद है, नदी के उस पार, किनारे-किनारे चलते हुए, मेरा हाथ अपने हाथों में, लेकर तुमने कहा था, 'हम हमेशा यूँ ही मिलते रहेंगे, थामकर एक-दूसरे का हाथ, आखिर तक साथ यूँ ही चलते रहेंगे।' तब ये सब बिल्कुल सच लगा था। जो हम पहली बार मिले, फिर मिलते चले गए, रोज-रोज,हर रोज यहाँ-वहाँ, हर जगह और इस बीच, पहली मुलाकात की याद, कहीं गुम हो गयी। क्या तुम्हें याद है, हमारी ये पहली मुलाकात, या शायद भूल गयी हो, बिल्कुल वैसे ही जैसे कि, तुम मुझे भूल चुकी हो। क्योंकि भूलना तुम्हारे लिए, कभी भयानक नहीं रहा हैं। क्या तुम्हें याद है? हमारी आखिरी मुलाक़ात, नहीं, शायद नहीं होगी, क्योंकि ऐसी कोई मुलाक़ात, कभी हुई ही नहीं थी, कि जिसे मैं आखिरी कह सकूँ। हर मुलाक़ात के, खत्म होने से पहले ही, जो तुम एक और मुलाक़ात, का वादा कर कर देती थी। तुम्हारे इसी वादें ने, कभी किसी मुलाक़ात को , आखिरी नहीं बनने दिया। लेकिन एक बार ऐसा भी हुआ, कि वादा करके भी उस दिन, तुम मिलने आयी नहीं थी, हमारी आखिरी मुलाक़ात भी वही थी, कि जब तुम मिलने आयी नहीं थी। उस दिन और उसके बाद, तुम फिर कभी मिलने, आयी ही नहीं, लेकिन तुम्हारे इंतजार में, उस नाव ने हँसना छोड़ दिया है, नदी अब पहले सी नहीं बहती है, गलियों ने अपनी जवानी खो दी है, और घाट की सीढ़ियों से तो, अब खून रिसता है। सुना है कि कोई जोगी, वहाँ अब भी भटकता है, अपनी सूनी सी आंखे लिए, सारी-सारी रात, आकाश को तकता है, इस उम्मीद में कि, उसके हिस्से में भी, थोड़ी सी धूप आ जाये, उसे भी अंधरे में, जरा सी रोशनी दिख जाये, और उसके जिस्म को भी, थोड़ी सी गर्माहट मिल जाये। -विकास रावल, -‎14 दिसम्बर,2017। #हिंदी #मुलाक़ात #hindi #yqdada #yqtales #yqdidi #yqbaba

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