#इंसानियत

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झरा आटत चालला, 
झरा आटत चालला
अजूनही बरेच दिवस होते उन्हाळ्याला
पाणी जणू बिलगले तापलेल्या धरणीला
कधी पुरात वाहवणारा पाऊस असा दुष्काळात  लपलेला
थेंबाथेंबासाठी इथं प्रत्येक जीव तरसलेला
घशाला कोरड सुखाला मुरड भेगा पडल्या पायाला
पोरं नि पिकांची काळजी जाळतेय इथं मनाला
घरधनीण रोजच हात लावे कपाळाला 
आलिया भोगासी सादर दोष देई नशीबाला
आणखी एक नवा विषय सापडला राजकारणाला
पाण्यासंगे माणुसकीही गेली काय रसातळाला

सू्ख रहा है इक झरना गर्मी से पहले ही जैसे पानी गया धरती की गोद में किसी रुठे बच्चे की तरह बाढ़ में बहाने वाला गायब हो गया अकाल बनकर बूंद बूंद के लिए तरसाने लगा सबको सूखा हैं गला ,उजड़ा है चैन जिंदगी का पांवों को भी पड़ गये छाले बच्चों की तरह पाली पोसी फसल की चिंता जला रही हैं मन को औरत हर घर की भी क्या करे.. किस्मत को कोसते काट रही हैं दिन हाँ,सियासत को एक नयी खाद मिली इस अकाल से शायद पानी की तरह इंसानियत भी सूखती जा रही... YourQuote Taai #अकाल #झरा #दुष्काळ #मराठी #माणुसकी #राजकारण #धरती #yqtaai #yqdidi #yqbaba #marathi #quote #twg #YoPoWriMo #इंसानियत

11 AUG AT 21:53