siddharth tyagi   (faltupoet)
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As above, so below
Joined 4 January 2017


As above, so below
Joined 4 January 2017
siddharth tyagi 8 OCT 2017 AT 12:57

Work without credit, work without a thought, work with the zeal of a hunter, sitting in dark thorny bushes, waiting patiently for his prey.

There is no gratification. There can never be any that can actually satiate the brain's cravings. Work.

It will never be enough, no matter how much more you labor along and how slowly you walk the thin rope that separates futility from fruition.

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siddharth tyagi 7 OCT 2017 AT 23:16

अब खीज होती है उन बातों से जिन से कभी दिन गुज़रा करते थे। वक़्त की खास बात थी कि हमेशा बदलता गया, बुरी बात थी कि उसके साथ लोग भी बदलते गए। कभी लगता था कि सब ऐसे ही काट जाएगा, लगता था कि हम मशीन हैं। सब पहले से लिखा है। वैधता, कीमत, ज़रूरत। पर अब नहीं। वक़्त ने सिखाया की न तो हम मशीन हैं और न ही कुछ लिखा है। सब खुद ही लिखना था इसलिये हाथों को मजबूत बनाने की कोशिश में न जाने कितने घर जला दिये। कमी रह गयी तो मशाल ले कर अपना जलाने चल दिये। वहां देखा तो पता चला कोई पहले से ही तैयार बैठा है। वक़्त गुज़रा और दुनिया भस्म। जब खुद जल कर अपनी खाल उत्तर रही थी तब एहसास हुआ कि मशीन ही थे। पुर्ज़े सब जंग खा गए हैं लेकिन।

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siddharth tyagi 7 OCT 2017 AT 23:03

I hate time because eventually it shows everyone's true colors.

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6 years of shit. #YQbaba #faltupoet

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siddharth tyagi 7 OCT 2017 AT 8:55

जो चीज़ कभी भी शुरू हो सकती है, वो कभी भी शुरू नहीं होगी।

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siddharth tyagi 7 OCT 2017 AT 8:40

Lived in dirty rooms all my life.
Spotless houses frighten me.

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Relationshit. You never know what people are capable of.
#faltupoet #YQbaba

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siddharth tyagi 7 OCT 2017 AT 8:37

Nothing but lost little children we were, looking for a way we'd never find.

I am glad that some of you were there. I am glad that some of you still are.

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siddharth tyagi 2 JUL 2017 AT 15:26

It goes on,
Will go on,
For special snowflakes.

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siddharth tyagi 29 MAY 2017 AT 20:45

Stuck with the wrong person, my syndrome won't end,
These shackles don't break, nor the vibes they send,
The dream once pristine, I know now were trivial,
For fallacies when come through, illusions: they bend.

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siddharth tyagi 27 MAY 2017 AT 1:58

कभी कभार अपनी गली को याद करता हूँ। और मन में सवाल बनाता हूँ। कोशिश करता हूँ पूछने की, पर जवाब हमेशा एक ही मिलता है। मैं बताऊंगा नहीं क्या मिलता है, क्योंकि मुझे याद नहीं।

एक दिन किसी ने मुझसे पूछा कि मेरा चेहरा अलग क्यों है। मैंने जवाब में कुछ कहा नहीं। बस एक नुकीला पत्थर उठा कर अपना चेहरा चीर दिया। उसने मुझे एक आईना दिया, और कहा अब तुम दुनिया के सबसे खूबसूरत आदमी लग रहे हो।

मैंने आईना देखा। शक्ल जानी पहचानी थी...

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siddharth tyagi 27 MAY 2017 AT 1:56


दिखने में सब तब भी ऐसे ही थे, अभी भी कुछ बदला नहीं। हां, बस चाँद अलग लगता है अब। हो सकता है जहां मैं पहले रहता था, अब वो घर छोड़ दिया हो। पर भूलभुलैया की हर गली एक जैसी लगती है। इसलिए घर कहाँ है, मुझे नहीं पता। मैं ढूंढने में अपना समय खराब नहीं करना चाहता इसलिए जो घर पास मिलता है उसमें रह लेता हूँ, ज़बरदस्ती। उसके बाद निकाल दिया जाता हूँ। मुझे खुशी नहीं मिलती, दुख भी नहीं होता। मुझे आदत भी नहीं हुई, बस चलता जा रहा हूँ। सभी की तरह, सभी से आगे, सभी से पीछे, सभी के साथ।

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