Rohit Shukla   (eloquent_empath)
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◆Doctor
◆Hobbies- Poetry, painting, music, photography
◆Nature lover
◆Have a nice day :)
Joined 11 February 2018


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Rohit Shukla 7 NOV AT 22:37

//हसरत//
तुझे पा लेना मुमकिन तो न था
हर शाम तन्हा उस मोड़ पर,
तेरा इंतज़ार न किया हो
ऐसा कोई दिन न था
पर वो रास्ता तुम तक कभी गया ही नही
जिसकी तमन्ना थी
वो राब्ता तुमसे कभी रहा ही नही

तेरी खुशबू, तेरी तबस्सुम
तेरी ज़ुल्फ़ें और तुम
और मेरी ये काँपती उंगलियाँ
फिरती तेरे लटों पर
ये बुझती लड़खड़ाती साँसे मेरी
गिरती तेरे लबों पर
ये साँसे थम न जाए की इक आखिरी दफ़ा
थाम लो इन हाथों को
इक आखिरी दफ़ा देख लूँ क़रीब से
ये साँसे थम न जाए की इक आखिरी दफ़ा
थाम लो इन हाथों को

निकल आओ बाहर इस तस्वीर से...

-रोहित शुक्ला©

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Rohit Shukla 1 NOV AT 13:03

//उलझन//
सारी बातें मौजूद हैं
मुलाक़ातें मौजूद हैं
मौजूद है,
तेरे साँसो की गर्मी भी
मेरे एहसासों की नरमी भी
सारे जज़्बात मौजूद है
दिल की हर बात मौजूद है
है मौजूद रातें भी
और जुगनुएँ भी
मौजूद हो तुम भी यहीं
मौजूद हूँ मैं भी यहीं
भींगो दिए पानियों ने
पर्दे दोनो शीशों के

...महज़ ख़्वाब था ये तो
कोई हक़ीकत नही...

रोहित शुक्ला©

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Rohit Shukla 31 OCT AT 21:25

//रिश्ते//

तीरा तीरा वो कमरा
तन्हाई रात में घुली घुली
खामोशी से उतरती है नसों में
ख़्वाबों के रेशमी चादर पे पड़ा पड़ा
जिसपर अब सिलवटें सी हैं
देखता हूँ ऊपर की जानिब छत को
उनपर दरारें देखता हूँ....
(Full piece in the caption)

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Rohit Shukla 31 OCT AT 15:36

//राख़//

...कोई चिंगारी रूठ सी गई
बेपरवाह, बेकाबू, भड़क उठी
हाथों से छूट सी गई
थी हवाएँ भी मेहरबाँ
होकर शोलों में तब्दील
कर दिया सब नेस्त-नाबूत...

(Full piece in the caption)

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Rohit Shukla 26 OCT AT 14:37

//खंडहर//

तकता है सड़क किनारे से वो खंडहर
अधमरा सा उस पार खड़े मकानों को
खुद कभी हुआ करता था एक घर....
(Full piece in the caption)

रोहित शुक्ला©

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Rohit Shukla 25 OCT AT 21:40

आमने सामने, दोनो आईने
एक दूजे का अक़्स दिखाते,

और फिर दिखाते चले गए...

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Rohit Shukla 25 OCT AT 11:55


उसके आँखों मे सैलाब है,
ख़्वाब उसके समंदर से गहरे होंगे...

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Rohit Shukla 24 OCT AT 15:41

//पिंजरा//
बाहर सर्द हवाओं की जुम्बिश है,
उस परिंदे की मानिद,
साँसों की गर्माहट कैद है
अब लबों में आवाज़ों के साथ....


(Full piece in the caption)
-रोहित शुक्ला©

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Rohit Shukla 22 OCT AT 18:02

//टुकड़ा//
मसरूर दौड़ते सरपट
दो नन्हे क़दम
आँखे दरख्शाँ जैसे
सितारे किसी फ़लक के
दिखा जो वो फ़रिश्ता
किसी जन्नत से
न कोई खिलौने वाला
न कोई गुब्बारे वाला,

एक टोकरी भरी खज़ानों से
जिसमे से निकला
चाँद का एक टुकड़ा
और दो हिस्सों में बाँट लिया
जैसे ये मुल्क बँटा है दो हिस्सों में,
एक जो भरपेट सोता है और
एक जो खाली पेट...

-रोहित शुक्ला©

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Rohit Shukla 21 OCT AT 16:11

//सिद्धार्थ//

खामोशी की गोद में सिकुड़ी हवाएँ
धुँधले अँधेरों में एक पत्ता नही हिल रहा,
चौतरफा कोहरे की चादर बाँहे फैलाये
भीतर एक बवंडर सा उठ रहा,
जिसमे सभी सवाल क्या, कैसे, बिखर गए हैं....

(Full piece in the caption)

-रोहित शुक्ला©

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