Language Festival 2018
Rakesh Singh

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Rakesh Singh (© Rakesh Kumar Singh "Sagar")

आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए बेशकीमती है। हिंदी मे लिखता हूॅ हिंदी पसंद भी करता हूॅ। दिल के भाव लेखनी के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास करता हूॅ। यथार्थवादी हूॅ। आलोचकों का ह्रदय से स्वागत है। मेरी रचनायें पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक पर क्लिक करें।

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#yqbaba #yqdidi #yqdada #yqhindi #yq लाचार सियासत है बहरे हैं सियासतदान मर चुकी है इन्सानियत मर गया इन्सान मर चुके हैं रिश्ते नाते मर गया स्वाभिमान परोपकारी से बलात्कारी है बन गया इन्सान माँ, बहन, बेटी न देखी हो गया हैवान कुकर्म इंसानों के देखकर डर गया शैतान सोंच रहा था मन में वो क्या है यही इंसान इंसानों के चेहरों से शैतान भी खौफ खाता है जिस्मों में इंसानों के अब इंसान नजर नही आता है नैतिकता के माने मर गये मर गये दया, धर्म और दान वाह प्रभु ,क्या चूक हुई तुझसे भी जो रच डाला इंसान हवस में डूबे वहशी दरिन्दे घूम रहे हैं गली गली डर लगता हर माँ, बाप को अब तो घर में न खिले, मासूम सी कली याचना यही है हे भगवान अब न हो जाना अन्तर्ध्यान पट मन्दिरों के खोल के आओ कुछ अपना भी फर्ज निभाओ कर ताण्डव त्रिशूल उठाओ अबलाओं की लाज बचाओ बलात्कारियों की लाशों से भर दो अब सूना श्मशान क्रूर विधर्मियों के आतंक से कब तक काँपेगा आसमान पांचजन्य से शंखनाद कर धर्मयुद्ध का करो ऐलान अर्जुन सदृश, गांडीव प्रत्यंचा का हे केशव फिर करो संधान भेद दो सीने बलात्कारियों के लाज बचाओ कृपा निधान ©राकेश कुमार सिंह "सागर"

YESTERDAY AT 22:27

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#yqbaba #yqdidi #yqdada #yqbhaijan #yq #yqhindiurdu कभी मन्दिरों में जाता हूँ कभी मस्जिदों में जाता हूँ कहीं हथेली फैलाता हूँ तो कहीं सर झुकाता हूँ पत्थरों को पूजते पूजते पत्थर सा हो गया हूँ है जहाँ में जिसका कोई तलबगार नहीं वो सूखा हुआ दरख्त हूँ, अब्तर सा हो गया हूँ दरिया हुआ करता था, मीठे पानी का कभी फ़कत खारा सा बेसबब, अब एक समन्दर सा हो गया हूँ खिजाँयें ही खिजाँयें है,  जिसके नसीब में शायद उजड़े हुए चमन का वो,  अब मंजर सा हो गया हूँ पत्थरों को पूजते पूजते पत्थर सा हो गया हूँ है जहाँ में जिसका कोई तलबगार नहीं वो सूखा हुआ दरख्त हूँ, अब्तर सा हो गया हूँ अब्तर-मूल्यहीन, नष्ट ©राकेश कुमार सिंह "सागर"               

27 MAR AT 21:06

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#yqbaba #yqdidi #yqdada #yqbhaijan #yq #yqhindiurdu चलो, आज फिर मैखाने में चला जाये उसी बोतल, उसी प्याले और उसी साकी से फिर मिला जाये फर्क जिसकी मोहब्बत में नजर आया न कभी एक बोसा प्यार का, उसी पैमाने को फिर दिया जाये गम गलत करते थे, जिन्दगी के, जिसके दर पे अक्सर चलो आज, उसी अंगूर की बेटी से फिर मिला जाये जख्म दिलों का कुरेदा था, खंजर-ए-यार ने कभी चलो, उसी खन्जर से,  आज जख्म-ए-दिल फिर सिया जाये कभी पीते थे मैकदे मे, ख़ुम-ए-सहबा जिनके हाँथों से एक जाम उन्ही के हाथों से आज फिर पिया जाये चलो आज फिर मैखाने में चला जाये उसी बोतल, उसी प्याले और उसी साकी से फिर मिला जाये ख़ुम- a pot of wine सहबा-wine, especially red wine ©राकेश कुमार सिंह "सागर"

20 MAR AT 19:40

Kashmir#AppOpenMic

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17 MAR AT 20:54

Palkein #AppOpenMic

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17 MAR AT 20:38

Palakein #AppOpecMic

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17 MAR AT 20:27

Zameer #AppOpenMic

#audioquote

17 MAR AT 19:58

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#yqbaba #yqdidi #yqdada #yq #yqhindi एक महबूबा मौत सी होनी चाहिए न नाज, न नखरे, न रूठना, न मनाना बस किसी रोज दबे पाँव चुपके से आना चले न जिसके सामने कोई भी बहाना बस अपने आगोश मे ले के दूर सफर पर निकल जाना न उलझने हों, न दुश्वारियाँ हो, न कोई भी हो गम फ़कत हर तरफ तनहाइयाँ हो बह हों वहाँ सिर्फ तुम और हम शिकवे भी न हो, शिकायतें भी न हो न ही रूसवाइयों का हो डर बस दूर गगन की छाँव में हो अपने अरमानों का घर मौत का डर नही जब मौत ही साथ है अपनी मोहब्बत से, बड़ी हँसी ये मुलाकात है ना मै दीवाना हूँ ना ही मैं हूँ पागल बस थोड़े अलहदा अंदाज और जुदा जज्बात है हो मौत सी महबूबा, शायद ये मुमकिन नही हो हर चाह मुकम्मल, ये हक तो किसी को हासिल नही फ़कत सिर्फ मौत ही तो है, जो बेवफाई नही करती है जीते जी साथ ना दे, न सही, पर साथ लेकर मरती है "सागर" मौत को ही एक दिन, मै भी महबूबा बनाऊँगा आगोश में सिमटकर,  उसी के पहलू में सो जाऊँगा ©राकेश कुमार सिंह "सागर"               

12 MAR AT 20:25

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(Pita-Father)

#yqbaba #yqdidi #yqdada #pita #yqhindi पिता पत्थर है बाँध का हकीकत है सपनों की उड़ान का उफनती धाराओं को रोंकता है लहरों के थपेड़े झेलता है कभी डूबता है कभी बच निकलता है पर कर्तव्य पथ से न डिगता है पिता बारिश में छाया है ये जीवन उसी से पाया है तूफानों को झेलता है पर मुँह से कुछ न बोलता है उम्र हकीकत से कुछ अधिक है मुश्किल भरी राँहों का पथिक है पिता कभी रोता नही चैन से सोता नही रात भर जागता है दुआँए माँगता है जिम्मेदारियाँ भारी हैं पर चेहरे पर इत्मिनान है हर मुश्किल का समाधान है पिता कभी कभी जेब से फकीर होता है पर बच्चों के लिए सबसे अमीर होता है पिता बच्चों की फरमाइशों की वो दुकान है जिसमें उनकी जरूरत का सब सामान है वो परिवार का आधार  है कुछ कड़क सा उसका व्यवहार है पिता प्यार जताते नहीं पर करते हैं बच्चों की खुशी के लिए किसी हद से भी गुजरते हैं पिता है तो परिवार है वो सावन के बारिश की फुहार है पिता है तो सपनों में जान है पूरे उसी से सब अरमान है दिल में असीम प्यार है बच्चों के लिए दुलार है पिता का विकल्प हो नही सकता पिता खुदा का दिया अनमोल उपहार है आँखों मे सपने हजार हों धन दौलत के भी अम्बार हों मजा तो 'सागर' तभी है जब पिता भी साथ हों पिता नही तो ये सपने ये दौलत सब बेकार है ©राकेश कुमार सिंह "सागर"

25 FEB AT 20:18