Rakesh Singh

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Rakesh Singh (©Sagar)

आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए बेशकीमती है। हिंदी मे लिखता हूॅ हिंदी पसंद भी करता हूॅ। दिल के भाव लेखनी के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास करता हूॅ। यथार्थवादी हूॅ। आलोचकों का ह्रदय से स्वागत है। मेरी रचनायें पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक पर क्लिक करें।

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Top tags: yqbaba yqdidi yqdada yq yqbhaijan
विरह
(अनुशीर्षक में पढ़ें)

#yqbaba #yqdidi #yqdada #yq #yqhindi #virah नीर बहा कर अँखियों से उसने सब कुछ कह डाला। अवशेष बचा था जो मन में चेहरे से मैने पढ़ डाला।। श्रृंगार रसों की कविता में मर्म विरह का घोल दिया। जो राज छुपाये थे उर में बातों बातों मे बोल दिया।। विरह प्रेम की विधा कठिन है समझाने का प्रयास किया। मिलने की आकाँक्षा ने ही हर प्रेमी को निराश किया।। मरू की तपती भूमि मे होती है जल की आस नही। पतझड़ में सृजन नही होता सागर से बुझती प्यास नही।। पुष्पित वृक्ष तभी होते जब रवि की गर्मी पाते हैं। प्रेमी भी पूर्ण तभी होते जब विरह में जल जाते हैं।। ये प्रेम, विरह की अग्नि में जलकर कुन्दन हो जाता है। इस अग्नि से जो तपकर निकले वो प्रेमी कहलाता है।।

YESTERDAY AT 19:54

पत्नियों पर अक्सर व्यंग्य सुने हैं पर उनके सम्मान में कम ही लिखा गया है। मेरी एक छोटी सी कोशिश सभी नारियों के सम्मान में।
(अनुशीर्षक में पढ़ें)

#yqbaba #yqdidi #yqdada #yq #yqhindi #priye मेरी कविता का श्रृंगार प्रिये। मेरे जीवन का हो सार प्रिये।। मेरे जीवन का अभिमान प्रिये। वीणा की मधुर हो तान प्रिये।। उर में नही अभिमान प्रिये। सब गुणों की तुम हो खान प्रिये।। मेरे घर का हो आधार प्रिये। मेरे जीवन का हो प्यार प्रिये।। बच्चों का प्यार दुलार प्रिये। ज्येष्ठों का हो संस्कार प्रिये।। मित्रों मे मेरी मित्र प्रिये। कष्टों में खेवनहार प्रिये।। हर बात का हो स्वीकार प्रिये। नहीं करती हो प्रतिकार प्रिये।। पुष्पों का जैसे पराग प्रिये। हम सबका हो अनुराग प्रिये।। हो फूलों का मकरन्द प्रिये। मेरे गीतों का हो छन्द प्रिये।। मेरे जीवन की हो आस प्रिये। नही करती कभी निराश प्रिये।। तपते सूरज में छाँव प्रिये। खुशहाली का हो गाँव प्रिये।। है तुमसे ये अभिप्राय प्रिये। जीवन का हो पर्याय प्रिये।। मेरी बगिया का हो फूल प्रिये। मत जाना हमको भूल प्रिये।। जीवन का नव निर्माण प्रिये। बसती है तुममे जान प्रिये।। मेरे जीवन का उपकार प्रिये। स्वीकार करो आभार प्रिये।। ©राकेश कुमार सिंह "सागर"

12 DEC AT 19:39

दूर गगन में सूर्यदेव भी अपनी आँखे खोल रहे।
पक्षी भी पुष्प लताओं पर कलरव की मिश्री घोल रहे।।
मंद मंद सी पवन बह रही सब जीव ज॔तु भी डोल रहे।
भोर सुहानी बाहर आयी तुम आलस्य क्यों ओढ़ रहे ।।
रमणीक छटाओं ने भी आकर डाला अपना डेरा है।
तुम भी उठो चेतन हो जाओ अनमोल बहुत ये सवेरा है।।
सुप्रभात्।

12 DEC AT 7:47