Rakesh Singh   (© Rakesh Kumar Singh "Sagar")
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Joined 4 November 2017


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Rakesh Singh 8 AUG 2019 AT 22:24

कुछ मुनासिब नही है अब हालात ये मेरे
तुम्हारे इर्द गिर्द ही घूमते हैं जज्बात ये मेरे

कोशिशें भुलाने की तुम्हे सब नाकामयाब हो चुकी हैं
फ़कत इतना समझ लो, बस मे नही है, अब अहसास ये मेरे

इज़्तिराब-ए-इश्क की इन्तहा ये है "सागर"
कि तसव्वुर में तुम, तख़य्युल में तुम और कटते नही दिन रात ये मेरे

इज़्तिराब बेचैनी
तसव्वुर/ तख़य्युल- कल्पना

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Rakesh Singh 24 APR 2019 AT 20:21

मैं इश्क, तुम शबाब
मैं बेहिसाब, तुम लाजवाब
तुम नशा, मैं शराब
न तुम खराब, न मैं खराब

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Rakesh Singh 27 DEC 2018 AT 19:57

ये जान, ये पहचान सब हवा करते हैं
चलो अपनी बीमारी की दवा करते हैं
मर्ज हर किसी को है यहाँ कोई न कोई
चलो किसी मैखाने में चल के दुआ करते हैं

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Rakesh Singh 23 DEC 2018 AT 22:12

ये जो जमाना है, बड़ा कमाल करता है
वो मेरे मरने पर भी सवाल करता है
बड़ी मोहब्बत से, जिसे घर में रखता है
ईद के दिन उसी को हलाल करता है

जब तलक पहलू में रहे, रूठे ही रहे
जरा सा छोड़ क्या आये, तो ख्याल करता है
कोशिश इतनी भी नही, कि रोशन हो सकें चराग भी
और आफताब न मिले, तो मलाल करता है

बड़ी दूर तक निकल आये हैं हम, जिनकी शोहबत में
वही यार, हमसे, अब लाखों सवाल करता है
मजबूर है वो भी, जमाने की रवायतों से, वरना
आँखों का अकेले में, वो समंदर सा हाल करता है

इतना आसान भी नही है, आशिकी में फ़ना हो जाना
यहाँ जनाज़ा भी आशिक का, कब्र तक बवाल करता है
ये जो जमाना है, बड़ा कमाल करता है
वो मेरे मरने पर भी सवाल करता है

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Rakesh Singh 21 DEC 2018 AT 22:35

जमीन के टुकड़े में कब्रें खँगालते रहना
हम न आयेंगे लौटकर, तुम पुकारते रहना

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Rakesh Singh 18 DEC 2018 AT 17:00

गज़ल की एक मुकम्मल किताब हूँ मैं
हर सफ़ें को पढ़ के देखो, लाजवाब हूँ मैं

सफ़ें- lines

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Rakesh Singh 17 DEC 2018 AT 13:53

बेटियाँ रुखसत करने का मलाल न होता
जमाने का इस कदर गर बुरा हाल न होता
बेटी होने पर कोई बाप आँसू न बहाता
गर दहेज के लोभियों का सवाल न होता

खुशनसीबी ये हर बाप की है, बेटियों को रुखसत करे
जमाने में बेटों सी, बेटियों की भी अज़मत करे
जमीं बिकी, मकाँ बिके सब बिक गया बाजार में
दहेज के लोभियों से फिर कैसे वो सोहबत करे व्यापार में

बेटियाँ हुईं तो अब डर लगता है
कैसे निबाहेंगे डर लगता है
नोच खायें न हमको दहेज की तिजारत करने वाले
ये जो न कर जायें वो कम लगता है

जला देंगे ये बच्चियों को
डुबा देंगे ये मोहब्बत की कश्तियों को
न ईमान है, न धर्म है इन वहशत के दरिन्दों का
कफन तक बेंच खायेंगे ये इन मजलूम परिन्दों का

दहेज के भिखारियों को कुछ तो सजा दो
बेटियों के माँ बाप को भी कुछ तो मजा दो
सजा दो इश्तिहार हर गली और मोहल्ले में
अरे ये भिखारी हैं, भीख में, जो हो तुम्हारी रज़ा दो

रज़ा- इच्छा
अज़मत- बड़ाई
सोहबत- संग, साथ

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Rakesh Singh 11 DEC 2018 AT 20:03

मुफलिसी के दौर हैं तो गुजर जायेंगे
उजड़े हैं चमन तो फिर सँवर जायेंगे
हम तो परवाने हैं तेरी महफिल के
छोड़ दोगे जो हमको तो किधर जायेंगे

तुम जो रूठे तो हम मर जायेंगे
ये दौलत, ये शोहरत भी लेकर किधर जायेंगे
जब उम्मीद ही न हो कि हासिल किनारा भी होगा
कैसे तूफानों की हम डगर जायेंगे

ये जो परिन्दे हैं चमन में, उड़ जायेंगे
सूखे दरख्तों से फिर ये बिछड़ जायेंगे
आशियाँ फिर बनायेंगे ये आबाद दरख्तों पर
सूखे दरख्तों पर, फिर न उड़ के आयेंगे

©राकेश कुमार सिंह "सागर"

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Rakesh Singh 6 DEC 2018 AT 21:52


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Rakesh Singh 6 DEC 2018 AT 19:13

तनहाइयों पर ज़माने में बेहिसाब जुल्म ढाये गये
तराने इन पर जब भी बने महफिलों में गाये गये


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