पूजा भारद्वाज "पंछी"   ("पंछी")
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Joined 19 November 2018


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Joined 19 November 2018

करीब इतना आओ कि साँसों का शोर सुनाए,
किस्सा यूँ लिखो इस रात का कि बिस्तर की सलवटें सुनाए।

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एक मुद्दत हो गई मिरे घर का रूख नहीं किया,
हम भी राबतें में है तुम्हारे सोचा तुम्हें याद दिला दें।

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बहुत हसीन थे वो साहेब , बेहद मासूम भी,
खेल-खेल में घर जला दिया उन्हें मालूम तक नहीं

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चूड़ियाँ सस्ती करवाई जाएँ अब बाज़ार में,
हिजडों की सरकार बनीं है हिन्दुस्तान में।

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झूठ लाख बुरा सही रिश्तों की आबरू तो रखता है,
जालिम तो ये मुआ सच है जो सबको बरहना करता है।

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ये जिंदगी तेरी राहें पहाडों की मानिंद,
मेरे पैरों मे तेरी आजमाइश के छाले है।

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अपने गुनाहों की तासीर पूछने वालों,
ज़मीर का आईना तो तुम भी रखते हो।

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हम कबूल करते है हमें मोहब्बत है तुमसे,
तुम भी अपना फैसला सुना कर हमें रिहा करो।

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मुबारक हो "भीम"आपका संविधान फिर तार-तार हो गया,
"राम" का नाम लेकर आज एक और मुसलमान हलाल हो गया

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ਕੁੱਝ ਰਾਂਹ ਮੱਲਿਆ ਜਿੰਮੇਵਾਰੀਆਂ ਨੇ, ਕੁੱਝ ਹੱਥ ਫੜਿਆ ਮਜਬੂਰੀ,
ਏ ਜਿੰਦਗੀ ਤੂੰ ਰੂਸੀ ਹੈ ਤਾ ਰੂਸਦੀ ਜਾ ਤੇਰੀ ਮਿੱਨਤਾ ਸਾਥੋਂ ਨਹੀਂ ਹੋਣੀ।


कुछ जिम्मेवारियों ने राह रोका ,कुछ अपनी भी है मजबूरी,,
ऐ ज़िन्दगी तू रूठी है तो रूठी रह, तेरी मिन्नतें हमसे नहीं होगी।

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