साईपूजा भारद्वाज "पंछी"   ("पंछी")
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Joined 19 November 2018


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Joined 19 November 2018

जो जुबाँ नहीं बोल पाती उसे हर्फ़ कह देतें हैं,
बस इसीलिए लिखते है और बे-हिसाब लिखा करतें हैं।

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मिरी तमाम हिकमतें जहाँ तिरे जब्र के आगे दम तोड़ देती है,
मैं उन्हीं नाकामियों से फिर तुम्हें चाहने की जिद्द ठान लेती हूँ।

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Wishing you a very Happy Birthday
Khan Saabh......

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जख्म तो भर गए निशान अभी बाकी है,
तिरी मौजूदगी का अहसास अभी बाकी है।


इतनी जल्दी क्यों है जाने की कंही और आग लगाना अभी बाकी है?
हमारी तसल्ली तो कराते जाओ हमारे कुछ सवाल अभी बाकी है।

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ਇਸ ਵੇਲੇ ਤਕ ਖੁਦ ਨੂੰ ਸਾਂਭਣਾ "ਪੰਛੀ" ਹੋਰ ਵੀ ਔਖਾ ਹੋ ਜਾਂਦਾ,
ਤੂੰ ਹੋਰ ਕਿਸੇ ਦੀ ਬਾਂਹਾਂ ਚ ਇਹ ਖਿਆਲ ਸੁੱਤੇ ਪਏ ਨੂੰ ਜਗਾਉਂਦਾ।

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हर वाह पर मिलती है नई शिकस्त साहब,
घाटे का सौदा है जी कारोबार शायरी का।

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शिकस्ता दिल से निकली आहें बनती है ग़ज़ल,
हम में कहाँ इल्म साहेब सुखन-ओ-शायरी का।

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एक उम्मीद थी तिरे आने की तोड़ दी हमने,
हसरत थी तिरे दीदार की वो भी छोड़ दी हमने,
किनारा कर लिया तुझसे तिरे ही अंदाज में,
जाने वालों को बुलाने की आदत छोड़ दी हमने।

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तुझ से फिर बात होगी या नहीं ये सोच कर परेशाँ नहीं हूँ मैं,
तू जान है मिरे किस हाल है तू यह सोच कर बेहाल हूँ मैं।

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बेशर्म ,बेहया, बदज़ात चाहें जो मर्ज़ी वो नाम दे,
तू तो कामिल है न ज़रा अपने गिरेबाँ में झाँक ले।

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