नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष   (नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष” ©)
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Joined 10 August 2017


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कान्हा कूँ सब जग खोजत है.....
Kanha koon sab jag khojt hai

उद्धरण में पढ़ें Read In Caption

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आप सभी के समक्ष मेरा नवीनतम भजन
"कान्हा कूँ सब जग खोजत है"

जल्द ही पढ़ने व सुनने को मिलेगा इसलिये
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झूठ कभी मत बोलिये, करें न व्यर्थ करार
यह अवगुण व्यवहार का, करते पनियाढार

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उत्कर्ष वाणी
"काम और दाम" इन दोनों का तालमेल तभी हो
पाता है जब, काम के अनरूप दाम, एवं दाम के
अनरूप काम हो, और इसके विपरीत परिस्थिति में
श्रमिक व स्वामी दोनों के मध्य तनावपूर्ण स्थिति
बन ही जाती है ।
राधे - राधे

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[उत्कर्ष उवाच]
अभी आजाद है जीवन, मजा इसका उठाओ जी
पड़ो मत व्यर्थ झंझट में, नहीं खर्चे बढाओ जी
हुई अब शादियाँ फिल्मी, मजे में भी सजा होती
भला है इश्क इससे तो, नई नित-नित पटाओ जी

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#nkutkarsh #yqlove
अन्यार्थ न लें ।
सादर
#प्रेम #आधुनिकता

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दोस्तों जय श्री कृष्णा ,राधे -राधे !

अभ्यासाध्दार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते
भावार्थ :-अभ्यास करने से विद्या प्राप्त की जाती है , उत्तम गुण कर्म ,स्वभाव से कुल का नाम उज्जवल होता है,श्रेष्ठ मनुष्य गुणों के द्वारा जाना जाता है,और क्रोध नेत्रों के द्वारा प्रकट हो जाता है। - चाणक्यनीति

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मुझे किस आधार का लेख/ कविता लिखनी चाहिये ?
१. देश भक्ति २. ईश भक्ति

३. हास्य ४. सामयिक
अपने विचार अवश्य व्यक्त करें ?

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कुण्डलिया : Kundaliyan
मारें तो इक मार ते, बू है धन की मार
औरन ते तो जी उठे, जा ते खाय पछार
जा ते खाय पछार, टूट तन मन यों जायें
मिलें न माँगे चून, प्राण भूखे अकुलायें
सुनो ! सार उत्कर्ष, भूख ते सबरे हारें
मारो धन की मार, कोउ कूँ जो तुम मारें

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