Mr. Musafir🎀   (मुसाफ़िर 👣)
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Joined 2 August 2019


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12 JUN 2021 AT 16:08

ग़ज़लें तमाम आपकी , जाया हो जाएंगी
गर प्रेम के सिवा, लिखा है कुछ और आपने

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7 JUN 2021 AT 19:30

सूने घर मे अहसासों की , माँ प्यारी सी मिठास है
बाप रौद्र रूप में हिमालय सा, उस घर का आकाश है

जिनसे हमने चलना सीखा, सीखी हमने दुनियादारी
सीख के हम यूं चार ही अक्षर, करते ना लिहाज है

अपने हिस्से का निवाला देकर, भूखा वो खुद रहता है
खुशियां सर्वस्व न्यौछावर करके भी ना रखता वो आस है

कभी मित्र है कभी गुरु है, कभी वो टिपिकल बाप है
हमेशा डाँट डपटते रहते फिर भी हृदय में प्रेम निवास है

जीवन का आधार बाप है, मुझ निज का उद्गार आप है
तपती भरी दोपहरी में , वो मीठी सी इक प्यास है

बुरे समय मे साथ छोड़ जब, दुनिया मे सब देते हैं
फिर भी रहता साथ हमेशा, परछाई सा वो पास है

करके सेवा माँ_बाप की, पा ले जन्नत को मुसाफ़िर
यहीं है काशी यहीं है काबा, इनमे ही ईश्वर का वास है

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14 MAY 2021 AT 20:03

ये वक्त क्यों इतना बे-रहम हो गया
क्या खुदा को भी अब वहम हो गया
ऐ खुदा हम सभी पर शिफा अता फरमा
शख्स ही शख्स ख़ातिर मरहम हो गया

"FULL PIECE IN CAPTION"

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24 FEB 2021 AT 12:20

कभी ख़्वाहिशो को भी ख़ुद से विरक्त कीजिये
वक़्त को भी थोड़ा सा अब वक्त दीजिए

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7 FEB 2021 AT 17:24

दिया था कभी गुलाब, हमने भी किसी गुलाब* को
पर दौलत की चाह में वो, गुल - ए - ग़ैर खिल गया

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4 JAN 2021 AT 13:43

कॉफी वालों का Flert लाख बेहतर
चाय वालों की #झूठी_मोहब्बत से

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3 JAN 2021 AT 20:25

इतवार का ही दिन , मुझे दिखाये सुकूँ के पल
माँ के आँचल में जब सिर रख , मीठी नींद लेता हूँ


वज़न-ए-काम से निपटकर, जब बैठता हूं मैं सबके साथ
लगता है मुझे मुसाफ़िर, जैसे इतवार कोई जन्नत हो

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23 DEC 2020 AT 11:49

क़ायनात से छिपा रखा था, मैंने अपना यह हुनर
दिखता हूं मैं जो , असल में वो हूँ मैं नही

बना लिया किरदार तुमने, ख़ुद से ही आँखों मे
हश्र होगा यह मिरा , मैंने सोचा था नही

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16 DEC 2020 AT 12:39

मैं लुट गया सरे बाजार, उनके आंखों के तफज्जुल में
वो शहर-ए-बाजार दूसरा था, मैं करता भी तो क्या करता

अभी काजल ही लगाया उसने, तो मिरा दिल होश खो बैठा
अगर सज संवर कर आ गयी सामने, तो खुदा ही जाने क्या मिरा होगा

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13 DEC 2020 AT 17:12

कल तक थे जो मुझको, पहचानते नही मुसाफ़िर
सुना है फिर से मैं उनको, अब याद आया हूँ

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