Mohit Munjal  
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Joined 29 November 2016


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Joined 29 November 2016
4 FEB 2018 AT 13:04

Thankyou for existing.
YOU MATTER!

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13 DEC 2017 AT 23:34

अक्सर सुबह उठकर,
तुम्हारे गालों की लाली का कारण सोचा करता था,
फिर एक दिन
पीछे मुड़कर,
चाँद को कोने से,
तुम्हें देखकर मुस्कराते हुए देखा ।।

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12 DEC 2017 AT 20:26

सुबह की सर्दी,
तुम्हारी सुनहरी पहली किरणों की गर्मी
और ‎सुकून

भला अलग थोड़ी ना है |

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11 DEC 2017 AT 12:35

इन गहरे सन्नाटों में
और वक़्त की गांठों में
देखो, कहीं खो मत जाना ||

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10 DEC 2017 AT 14:29

जिस क़द्र से तुम
बादलों के कंबल के बीच से
सवेरे सवेरे झाँकती हो,
मन करता है की
ये सुबह
कभी ख़त्म ही ना हो ||




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10 NOV 2017 AT 1:40

8 OCT 2017 AT 13:31


कुछ सुलझी सी तुम,
कुछ उलझा सा मैं l

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8 OCT 2017 AT 12:36

5 OCT 2017 AT 11:00

आज हार ने आइने में खुद को देखा,
सामने तुजुरबा खड़ा था ।

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25 SEP 2017 AT 20:18

"और क्या चल रहा है?"
"समय और सांसें"

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