Indu Singh

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काश ! इक रोज़ ऐसा हो जाए 
याद से मेरी तू बेचैन हो जाए...
जब सुनने की जिद मैं न करूँ 
सुनाने को तू... बेचैन हो जाए....

10 JUN AT 17:50

कितना कुछ 
कहना होता है
नहीं कह पाती
इसलिए नहीं
कि वक़्त की कमी है
या कहने की हिचक
बस...
पास नहीं होते हो तुम
जबकि
सबसे पास तो 
तुम ही हो !!!

8 JUN AT 10:31

गगन में दो चाँद इक साथ जा बैठे
रात हुई हैराँ ये हुआ क्या है आज ।

11 MAY AT 17:47

एक आवाज़ सुनने को सभी तरसते हैं,
हो ख़ामोश अरसे से या सुना नहीं सबने...

7 MAY AT 14:34

प्यार बंधन नहीं चाहता
बस यही एक खामी है उसकी
जबकि बिना बंधे कोई रिश्ता 
चल ही नहीं पाता
लड़खड़ाता है बस !!!

4 MAY AT 12:41

यूँ रोज का टूटना 
टूट कर बिखरना
बिखरे को समेटना
समेट कर जोड़ना
और फिर से चल पड़ना
है यही ज़िंदगी...है यही ज़िंदगी।

1 MAY AT 18:34

पका गेंहूँ, खरे सोने सी चमक उसकी 
बंद मुट्ठी में, भरी हुई खनक उसकी
पिस जाती है ज़िंदगी की ज़रूरतों के बीच।
सोने सा रंग, दूधिया हो चला 
थोड़ा और पका, फिर ख़त्म !!!

24 APR AT 18:25

यादों का बसेरा है 'रूह' की गली में
जिस्म बौखलाया, न रूह ढूँढ़ पाए ...

4 APR AT 9:50

कुछ रिश्ते गुल्लक में सहेजे हैं बड़े जतन से
डर बस इतना कि नाज़ुक है गुल्लक बहुत ।

22 MAR AT 12:08


इश्क बिना ज़िंदगी का गुज़ारा हुआ है कब 
ये तड़प का ही रिश्ता हमारा हुआ है अब !!

1 MAR AT 15:47