Indu Singh

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अबकी बार जो उठा फिर न गिरेगा
बिखरे हुए रिश्तों जी भर के देख लो उसे।

13 FEB AT 21:01

आजकल चुप-चुप सा रहता है
वक़्त है !
कब तलक शोर करेगा।

10 FEB AT 14:53

रखूँ इत्तफ़ाक हर बात से ज़रूरी तो नहीं 
कुछ ख़याल हमारे भी बिखरे हैं फ़िज़ा में।

8 FEB AT 12:54

वो बात ही क्या जो बवाल न बन सकी
वो लोग ही क्या जो बवाल न ला सके
बिन बवाल ही ज़िंदगी जब बवाल सी लगे
सच है, तब मुस्कुराने में भी बवाल ही मचे ।

16 JAN AT 17:32

ख़ुदपरस्त, दुनियापरस्त लोगों ने
हमसे भी जोड़े थे रिश्ते बहुत
दिखते हैं वो आज भी
नए मोहरों के साथ खेलते हुए
पाती हूँ खुद को अकेला 
अपने सिद्धांतो और आदर्शों के मध्य
भीड़ भरे जहाँ में ' एकला चलो रे '
आसान कब हुआ है !!!

10 JAN AT 17:49

आओ झूठ की दुनिया, तुम्हें जीते हैं।

29 DEC 2017 AT 18:21

एक स्त्री की प्रथम प्राथमिकता उसके पति , परिवार और फिर उसके बच्चे थे। एक स्त्री नितांत अकेली जूझ रही है ज़िंदगी से। एक स्त्री ले रही है अंतिम साँसे और माँग रही है दुआ सलामती की अपने पति और बच्चों की। एक स्त्री मर रही है और कोसों दूर उसकी चीखें सुन रही है एक स्त्री। दोनों की ही चीखें बेहद शांत हैं !!!!

28 DEC 2017 AT 18:56

चिंता कभी हल नहीं देती
हल खोजने पड़ते हैं 
फिर भी चिंता बिन बताए आ ही धमकती है।

27 DEC 2017 AT 10:47

साँसों की बुनी शॉल , आ के यूँ  लिपटी
आज फिर तेरी याद ने, याद बहुत किया !!!

18 DEC 2017 AT 11:35

न दरिया की चाह न समंदर की तलाश 
इक बूँद हूँ मैं, न चाहूँ  बनना ख़ास !!!.

10 NOV 2017 AT 16:27