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Indu Singh

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क्यों अहसास भर तुम्हारा 
लबों पे फ़ैल जाता है 
और पलकें 
उठती नहीं फिर....!

अबकी बार जो उठा फिर न गिरेगा
बिखरे हुए रिश्तों जी भर के देख लो उसे।

आजकल चुप-चुप सा रहता है
वक़्त है !
कब तलक शोर करेगा।

रखूँ इत्तफ़ाक हर बात से ज़रूरी तो नहीं 
कुछ ख़याल हमारे भी बिखरे हैं फ़िज़ा में।

वो बात ही क्या जो बवाल न बन सकी
वो लोग ही क्या जो बवाल न ला सके
बिन बवाल ही ज़िंदगी जब बवाल सी लगे
सच है, तब मुस्कुराने में भी बवाल ही मचे ।

ख़ुदपरस्त, दुनियापरस्त लोगों ने
हमसे भी जोड़े थे रिश्ते बहुत
दिखते हैं वो आज भी
नए मोहरों के साथ खेलते हुए
पाती हूँ खुद को अकेला 
अपने सिद्धांतो और आदर्शों के मध्य
भीड़ भरे जहाँ में ' एकला चलो रे '
आसान कब हुआ है !!!

आओ झूठ की दुनिया, तुम्हें जीते हैं।

एक स्त्री की प्रथम प्राथमिकता उसके पति , परिवार और फिर उसके बच्चे थे। एक स्त्री नितांत अकेली जूझ रही है ज़िंदगी से। एक स्त्री ले रही है अंतिम साँसे और माँग रही है दुआ सलामती की अपने पति और बच्चों की। एक स्त्री मर रही है और कोसों दूर उसकी चीखें सुन रही है एक स्त्री। दोनों की ही चीखें बेहद शांत हैं !!!!

चिंता कभी हल नहीं देती
हल खोजने पड़ते हैं 
फिर भी चिंता बिन बताए आ ही धमकती है।

साँसों की बुनी शॉल , आ के यूँ  लिपटी
आज फिर तेरी याद ने, याद बहुत किया !!!