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Gaurav Kumar Dubey (गौरव कुमार)

जीवन का आधार प्रेम है
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Gaurav Kumar Dubey YESTERDAY AT 10:30

सीस के बिना ही धड़ लौटाए थे माताओं को
इस बार माँओं को न धड़ भी दे पाए हैं
इंच इंच नाप के जो ले गए थे बेटे आप
इंच इंच होके कटोरों में शव आये हैं
पाक के नापाक मंसूबों को पीछे देख लेंगे
पहले वो जो भेड़ियों को घर में छिपाए हैं
चौराहे पे गोलियाँ उतार देना उनमें जो
बोलने से पहले अपनी शर्म बेच खाये हैं

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Gaurav Kumar Dubey YESTERDAY AT 10:21

हाथ में कलम थाम सोचता रहा सदां मैं।
कैसे लेखनी का कर्ज हम तो चुकाएंगे।।
सीमाओं पे मरते हैं देश के जवान और।
यहाँ हम पायलों पे लिखे गीत गाएंगे।।
देश प्रेम से बड़ा तो कोई भी नहीं है प्रेम।
चंद्रवरदाई की परंपरा निभाएंगे।।
मातृभू से प्रेम जो किया है वक़्त आ गया है
जान दे जहान के ही मान को बढाएंगे।।

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Gaurav Kumar Dubey 9 FEB AT 3:50

चींख को रोका हुआ है, कंठ में हमने दबाकर
आँसुओं को हक़ नहीं है, आँख की दहलीज लाँघें

है बहुत आसान लगता, जैसे रूठे को मनाना
छोड़कर बेफिक्र सोये, देवता अपने जगाना
बोध अपराधी भरा है , फिर न दोहराये कहानी
राज में भूले हुए नृप, मुद्रिका का साक्ष्य मांगें
आँसुओं को हक़ नहीं है..........(1)

हिचकियाँ आती भी हैं तो, घूंट भर लेते हैं जल की
प्रेम को ही कर्म माना, छोड़कर इच्छाएं फल की
हम अंधेरे रास्तों पर, बिन दिए ही चल दिये हैं
कह रहा यूँ वक़्त हमको आप सोएं स्वप्न जागें
आँसुओं को हक़ नहीं है...........(2)

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Gaurav Kumar Dubey 9 FEB AT 2:06

चींख को रोका हुआ है, कंठ में हमने दबाकर।
आँशुओं को हक़ नहीं है, आँख की दहलीज लांघें।।

है बहुत आसान लगता, जैसे रूठों को मनाना
छोड़कर बेफिक्र सोये, देवता अपने जगाना
बोध अपराधी भरा है , फिर नहीं दोहरे कहानी
राज में में भूले हुए नृप, मुद्रिका का साक्ष्य मांगें
आँशुओं को हक़ नहीं है..........(1)

हिचकियाँ आती भी हैं तो, घूंट भर लेते हैं जल की
प्रेम को ही कर्म माना, छोड़कर इच्छाएं फल की
हम अंधेरे रास्ते पर, बिन दिए ही चल दिये हैं
कह रहा यों वक़्त हमको आप सोएं स्वप्न जागें
आँशुओं को हक़ नहीं है...........(2)

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Gaurav Kumar Dubey 7 FEB AT 7:23

पलकों पे सजा के रखा है हमने तो ख़्वाब को
फिर रोज डे क्या विश करूँ अपने गुलाब को

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Gaurav Kumar Dubey 3 FEB AT 10:10

मेरी चीखें सब कागज में कैद हुईं।
आँसू भी निकले तो बनकर गीत मेरे।।
जितने दर्द मिले सब कंठ ने गाये हैं।
अब आगे को कुछ तो दे मनमीत मेरे।।

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Gaurav Kumar Dubey 20 JAN AT 14:49

कभी धर्म था आड़े आया
कभी मान ने रस्ता रोका
कभी लोक लज्जित होता तो
कभी था मर्यादा ने टोका
न जाने किस मजबूरी ने
साथ तेरा तक छीन लिया जब

तब जाकर मैंने ये जाना
कोई प्रेम के साथ नहीं है।
प्रेम पे रब का हाथ नहीं है।

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Gaurav Kumar Dubey 8 JAN AT 19:35

आपने कुछ यूँ किया कि, है बचा कुछ भी नहीं
दोस्ती के नाम पर बस याद बाकी रह गयी।।

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Gaurav Kumar Dubey 5 JAN AT 9:18

उनका साथ निभाना भी तो
मौषम मौषम बदल गया।
और अहम में खुशी भरा पल
मेरा गम में बदल गया।।
उनको सबकुछ याद रहा है
बस मेरा गम भूल गए।
माफ कीजिये आज से हम
भी अबतो तुमको भूल गए।।

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Gaurav Kumar Dubey 2 JAN AT 6:58

तट पनघट वंशीवट अब क्यूँ घूमेंगे बेकार में।
नए साल से बैठ गए हैं, हम तेरे इंतजार में।।

माना पाना सरल नहीं है ये भी हमको ज्ञात है
खुद आओ तो आओ नहीं मेरी क्या औकात है
खुशियां मेरी सब तेरी हैं , तेरा हर गम मेरा है
मेरी वजह से सर न झुकेगा वादा है ये प्यार में
नए साल से बैठ...........

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