Gaurav Kumar Dubey   (गौरव कुमार)
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जीवन का आधार प्रेम है
Joined 11 April 2017


जीवन का आधार प्रेम है
Joined 11 April 2017
Gaurav Kumar Dubey 4 HOURS AGO

मेरा तेरे जीवन में एक दिन उधार है।

न फिक्र न जिक्र न ही खोना न पाना है
एक दिन में मुझे एक उम्र को समाना है
जिंदगानी मेरी एक दिन पे निसार है ।
मेरा तेरे जीवन में........

सुलझाऊँ बाल, गाल छुऊँ न चाह है
मैं चूमूँ चरण चिन्ह इतनी सी चाह है
वंदन न बंधन होना तुमको स्वीकार है
मेरा तेरे जीवन में........

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Gaurav Kumar Dubey YESTERDAY AT 10:03

शरहद पर लायी है राखी,
एक बहना का प्यार जी।।
राखी बोली मेरी कलाई ,
अब देश पे रही उधार जी।।

राखी है संदेश बहन का
रक्षा धर्म निभाना है
एक बहन का नहीं है जिम्मा
देश का तुम्हें उठाना है
सैनिक बिन सूने हैं देश के
मानो सब त्योहार जी
राखी बोली.....1

कुछ राखी बापस आयी हैं
गयीं कलाई छोड़ के
नभ से रिश्ता जोड़ लिया है
जग से रिश्ता तोड़ के
शरहद से राखी अब लौटे
न देश करे स्वीकार जी।।
राखी बोली......2

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Gaurav Kumar Dubey 31 JUL AT 1:23

हमने अँजुरी भर दुख झेले।
उन तक को गीतों में गाया।।
होंगे कितने दुख के सागर ।
जिनको कहना ही ना आया।।

जब सौंपी कलम विधाता ने, कुछ सोच भरी होगी मन में
कुछ फूटे होंगे बीज कुलक, कुछ बेचैनी होगी तन में
सोचा होगा ये गायेंगे, जनमानस की पीडाओं को
दुख बहुत हुआ होगा पाकर , गीतों को धन के आँगन में

आँसू को कैद रखा होगा, गीतों की फसल उगाने को
पर उसको मोती बनना था , जो सीपी तक ना आ पाया
होंगे कितने दुख के सागर
जिनको कहना ही ना आया.....2

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Gaurav Kumar Dubey 31 JUL AT 1:19

हमने अँजुरी भर दुख झेले।
उन तक को गीतों में गाया।।
होंगे कितने दुख के सागर ।
जिनको कहना ही ना आया।।

लिख कर के चार पँक्तियाँ भर, जाने हम कितना ऐंठे हैं
दरदों के कितने खंडकाव्य, आँखों में लोग समेटे हैं
हमने सीमाएँ लाँघी हैं, देखो कितने ओछेपन की
जो खोकर तुमको पाये थे , हमने वो आँसू बेचे हैं

दुख हमने तो ना दूर किये, नाखूनों से नासूर किये
है कितनी कलम अभागी ये, जिसको बस क्रंदन ही भाया

होंगे कितने दुख के सागर
जिनको कहना ही ना आया.....1
क्रमश:

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Gaurav Kumar Dubey 28 JUL AT 10:23

तुम अपने में मस्त हो
हम अपने में मस्त
तुम तो कब से व्यस्त थे
अब से हम हैं व्यस्त

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Gaurav Kumar Dubey 27 JUL AT 22:10

अंतर है बहुत बड़ा
अपने और सपने में
धोखा खा जाता हूँ
लोगों को समझने में

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Gaurav Kumar Dubey 22 JUL AT 0:34

रिश्तों के बीच मे रिश्ते हैं
अब मोल को भाव तरसते हैं
ये वक़्त ने हमें सिखाया है
काजल से आँसू सस्ते हैं

तेरे घर का पता, पता है पर
ख़त लिखना हुआ खता है पर

ये सच है मूरत बनने में
सूरत को जमाने लगते हैं

सम्बन्ध बचाने की खातिर,
अनुबंध बनाने पड़ते हैं।।
जीने की खातिर साँसों पर,
प्रतिबंध लगाने पड़ते हैं।।

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Gaurav Kumar Dubey 10 JUL AT 6:54

हमने अँजुरी भर दुख झेले
उन तक को गीतों में गाया
होंगे कितने दुख के सागर
जिनको कहना ही ना आया

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Gaurav Kumar Dubey 28 JUN AT 6:28

पेट की खातिर बहाने वो पसीना
आँख को आँसू बहाते छोड़ आया

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Gaurav Kumar Dubey 24 JUN AT 0:01

रात की ख्वाहिश न जाने,
शाम से क्यों हो रही है
ख्वाब तजकर फिर अचानक
आँख आँसू बो रही है
मोल पीड़ा का चुकाने
राम वन में आ गए हैं
चरण से लग कर शिला
फिर से अहिल्या हो रही है

हार फिर से आज खुशियाँ दे रही है
और पीड़ा दे रही है जीत कोई।।

प्रेम जाने क्यों हमारी देहरी पर
गा रहा है आज फिर से गीत कोई
हैं सुनिश्चित दूरियाँ अलगाव जग से
उस सफर का बन रहा है मीत कोई।

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