Devansh Arora  
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Joined 21 December 2017


Joined 21 December 2017
Devansh Arora 23 HOURS AGO

Down on the ground, getting drowned, hearing no sound,
So many voids but nowhere to look around.
Oh down down down,
Lying on that same ground,
In this mess once again I am found,
Heavier than that music, today my heart sound.
Oh round round round,
That same damn song playing around,
Ain't telling anyone or I'll be frowned,
Intact body but maybe that soul broke down.
Oh drowned drowned drowned,
Deeper and deeper in this weird compound,
Those darks down here make me feel astound,
Like this valley behold this lone and loud hound.
Oh sound sound sound,
Can't hear or feel any damned sound,
All this when there are so many screams inbound,
Weather seems changed but this place always have the same background.
Down on the ground, getting drowned, hearing no sound,
So many voids but nowhere to look around.

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Devansh Arora YESTERDAY AT 2:49

Aye you, wanna take a leap with me?
Believe I've got that one key?
Heard that you're painting these days,
Around those sights if you need a break, won't mind the delays.
Get your heart in that knapsack,
I promise that I'll try my best to be on track.
I might be getting distracted now and then,
Because seeing those silly habits I fall in love all over again.
Remember to tag along gratuitous smiles,
They would surely help me around those miles.
Those endless stories are a must for such destinations,
Would be great for when we'll be waiting around at stations.
Don't forget that curiosity those eyes behold,
See all those roads on maps, that's how they get mould.
All this and one last thing about those hairs,
Well they kinda lessen the awkwardness of my stares.
Maybe all I am trying to say here is,
I wanna explore only with you, each and every territory there is.
So, wanna take a leap with me?
Believe I've got that one key?

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Devansh Arora 15 APR AT 2:54

वो जाती सी शाम, रुका सा समा,
ठंडी हवा, और इस सब में खूबसूरत सी वो बला।
सफ़ेद कुर्ती और आँखों में वा गहराई,
हमे तो लगा जनाब आज तो मौत खुद हमारे दर पर आई।
कुछ कदम की दूरी जो कम हुई,
मानो मेरी समझ कहीं खोई सी होने को रही।
कहने को तो बस मामुली से कुछ हाल-चाल ही थे उसने पूछे,
और मुझ कहानियाँ लिखने वाले के पास इसके कई हज़ारों जवाब थे होने।
पर शायद उसके सामने बेवकूफियाँ ही पसंद है इस दिल को,
हो भी क्यों ना, हंसी जो देखनी होती है उसकी इन आँखों को।
कल भी कुछ मिलता-जुलता ही‌ आलम था, होना है कल भी कुछ यूं ही,
मोहतरमा ये बेकार से इशारे समझ सके हमारे, ख्वाइश तो है इस दिल बंजारे की ज्यूं ही।
जो न भी समझ सकी, तो ऐसा भी क्या गम है,
इस रोज़ की ये कुछ मिनटों की मुलाकात से ही हम तो हो जाते मुकम्मल हैं।

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Devansh Arora 12 APR AT 2:07

Ok maybe lets not meet again,
Have been through this heavy duty campaign.
Ain't about wanting or not anymore,
Maybe now I just want to get ashore.
Might still call you sometimes,
Hope that answering won't cost you a lot of dimes.
Couldn't burry that story,
But have to strand it just to save it from turning hoary.
Someday if you too feel low,
Maybe you can visit me tiptoed.
Might not hear about you from me again,
But I hope you'd have the faith that in bad situations I'd remain.
Actually planned to meet you around some place beautiful,
But in reality its just not commutable.
Although as I said, lets not meet again,
I will ride again that last train.
Taking commute to that last station of the territory,
To bid adieu, not one articulatory.
Never realised how quick some pages can pass by,
Nevertheless, would fill up that last page today completing story thy.

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Devansh Arora 6 APR AT 2:06

कुछ सवाल थे ये इस दिल के,
दे सकोगी क्या जवाब आज मिल के?
कि क्यों कभी-कभी कुछ खुद में सी खोई सी रहती हो,
क्यों कभी-कभी वो बिस्तर छोड़कर भी सोई सी रहती हो‌,
मन ही मन क्यों यूं बेमतलब मुस्कुराती हो,
कैसे एक किताब अधूरी छोड़ दूसरी उठाती हो,
कैसे एक कहानी सुनाते हुए कहीं दूसरी में खो जाती हो,
उन ज़ुल्फों को जो कभी-कभी यूं ही खोलकर लहराती हो,
छोटी-छोटी बातों पर कैसे कभी-कभी बेवजह ही खुश हो जाती हो,
कभी-कभी क्यों खुद से ही नाराज़ हो जाती हो,
कैसे उन आँखों के सहारे अपनी हर ज़िद पूरी करवाती हो,
वो जो सुबह उठते ही कैसे इतनी‌ खूबसूरत लग जाती हो,
जाने के बाद भी क्यों कभी-कभी मुझसे मिलने उन ख्वाबों में आती हो,
आकर फिर वही छोड़ी हुई गलियाँ याद दिलाती हो,
आते हुए जो एक तूफ़ान सा साथ लाती हो,
पर जाते-जाते उन यादों को कैसे सुकून की तरह दे जाती हो,
कुछ सवाल थे ये इस दिल के,
दे सकोगी क्या जवाब आज मिल के?

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Devansh Arora 5 APR AT 0:47

मंज़िल से मोहब्बत तो सभी करते हैं,
शायद इसीलिए जीतकर भी हारते हैं।
करके तो देखो आशिक़ी उस सफ़र से,
खुशियांँ कई ज़्यादा मिलने को आएंगी तुमसे।
ये मंज़िल तो उस पहले प्यार सी है,
है तो सबसे खूबसूरत पर ज़्यादा ठहरती कहाँ है।
सफ़र का ताल्लुकात है उस एक माशूका से,
वो, जो परेशान कितना ही करे, घबराती है छोड़कर जाने से।
मंज़िलों से दिल्लगी जो करी,
भटकना पड़ेगा ज़िंदगी सारी।
बाकि सफ़र तो ज़िंदगी का ही नाम है,
इसे भला कहांँ ढूंढना है।
तो मंज़िलों का पीछा छोड़, उस सफ़र से रखो जज़्बाती कारोबारी,
क्या पता कब कौनसी खुशी से मिलवा दे ये माशूका तुम्हारी।

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Devansh Arora 4 APR AT 1:07

कुछ बातें हैं जो कभी बताई नहीं उसे,
उसको बता देना मिले जो तुमसे।
बताना कि उसे कि उसके पागल बुलाने पर भी प्यार आता था मुझे,
कभी गुस्सा भी हो जाता तो मनाना भी तो आता था यार उसे।
बताना इस बेशऊर कलाकार ने उस चेहरे को कागज़ पर उतारने की कितनी नाकाम कोशिशें की है,
कभी समझा ही नहीं कि उसके जैसी तो ऊपरवाले से भी दूजी न बनी है।
बताना कि हर वो अजीब हरकत उस हंसते हुए चेहरे को देखने के लालच में थी,
निहारता ही रह गया मैं तो बस उसे, कह ही नहीं सका वो बातें जो दिल में थीं।
बताना कैसे ये नासमझ, शब्दों का दुश्मन इन शब्दों को ही हमदर्द बना बैठा,
अब‌ इससे बढ़कर जज़्बातों को कम से कम मैंने तो कभी नहीं देखा।
इतना शायद काफ़ी होगा इस बार के लिए,
और हाँ, जब सुनाओ कहानी ये, तो सुनाना बिना लिखने वाले का नाम दिए।
अगर पहचान सकी वो, तो मैं ज़रा खुश हो लूंगा,
जो न पहचानी सकी, कही ही नहीं कभी ये मान लूंगा।

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Devansh Arora 31 MAR AT 1:42

खुशियों से तारुफ करवाने वाले अकसर गम से भी तकल्लुफ करवा कर ही जाते हैं।

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Devansh Arora 31 MAR AT 1:41

लड़खड़ाते अल्फ़ाज़ों को कभी मेरी कमज़ोरी मत समझना,
वो तो बस मैं समझता हूंँ कि क्या कुछ कर सकते हैं ये चंद अल्फ़ाज़।
गम तो बस इस बात का है कि अब उन जज़्बातों को मैंने कभी नहीं कह पाना है,
पर चलो इतना वादा रहा, रोज़ करूंगा इन्हें कह पाने का रियाज़।

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Devansh Arora 23 MAR AT 23:52

Arm around his recent rebound,
Once again thought about that queen crowned.
Round and around going in life,
Have considered only her as wife.
Still some clean water go down the drain washing away dirt,
Just so the story didn't leave him unhurt.
Flashed the memory of that single sentence,
That single text that turned out to be the biggest menace.
What a birthday gift did she plan for him,
Gave birth to his heart's phantom.
Waiting for that single wish,
Not knowing what it was going to squish.
An innocent heart walked here and there in exhilaration,
Little did this train knew about the next station.
A message popped up on the screen,
Till the day he's still looking for that missing part in the machine.
A ballpark figure would be alright to describe the number of tries,
Today its a different kind of personality that he do advertise.
No questions asked, a romantic novel was labelled as a weekly magazine,
No one ever tried to read the story inside because truly no one was ever keen.
The one, who everyone considered a nutcase,
Was nothing like that but a ruined trace.

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