Avinash Kumar   (अविनाश "कर्ण")
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Joined 14 July 2017


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Joined 14 July 2017
Avinash Kumar 12 DEC AT 13:16

हर वो शख़्स जिसे
दिखा नहीं चाँद
अमावस की रातों में,
जिसे हासिल ना हो सका
प्रेम के प्रतिउत्तर में
समुचित प्रेम,
उसने कह दिया
कि अमावस का चाँद
कुछ भी नहीं
बस एक मनगढ़ंत बात है,
उसे देखने वाले लोग
बिल्कुल अंधे हैं,
और कर दिया ऐलान
कि प्रेम अक्सर लोगों को
अंधा बना देता है ।

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Avinash Kumar 4 DEC AT 12:46

"मरुस्थल"
प्रमाण है
इस बात का
कि अत्यधिक इंतज़ार,
उपेक्षा और तिरस्कार से
सूख जाता है कभी न
ख़त्म होने वाला
अथाह प्रेम का दरिया,
और चट्टान की तरह
शुष्क और सख़्त
बन जाते हैं,
कभी पानी से रहे
सरल, स्वछन्द
प्रेमी ।

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Avinash Kumar 30 NOV AT 15:45

जिस दिन से समाज के छोटे सोच
और इसके खोखलेपन ने समझा है
स्त्री और पुरुष के अधिकारों को अलग-अलग,
उनके लिए बनाए नियम और कायदे
अलग-अलग और कोशिश की है उनके
व्यवहार, विचार और जरूरत को
अलग-अलग तराज़ू पे तौलने की,
बस उसी दिन से,
पौरुष का मुखौटा पहने नपुसंकता के हाथों
मानवता की निर्मम हत्या होती चली आ रही है।

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Avinash Kumar 29 NOV AT 20:06

अक्सर बेरंग होती है हक़ीक़त की दुनिया
तुम अगर लिखना तो बस ख़्वाब लिखना

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Avinash Kumar 23 NOV AT 17:13

ताउम्र क़ुबूल है मुझको, ये रातों का अंधेरा
गर इश्क़-ए-महताब, मेरे हिस्से में आ जाए

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Avinash Kumar 11 NOV AT 13:35

मैं जब भी रात लिखूं तुम महताब लिखना
हर इक बे-जवाब ख़त का जवाब लिखना

हर किसी ने लिखा बस चाँद का चमकना
हो सके तो तुम चाँद का अज़ाब लिखना

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Avinash Kumar 7 NOV AT 19:13

अंधेरा हो चुका है ये चाँद को बताता कौन होगा
प्रेम कितना है करना, कायदे बनाता कौन होगा

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Avinash Kumar 4 NOV AT 13:19

ख़्याल तेरा, है दिल से जाता नहीं
इश्क़ है मगर, जताया जाता नहीं

कब तलक यूँ, करता रहूँ मैं इशारे
बात अब और छुपाया जाता नहीं

सुनाई थी जो तुमने कहानी कभी
वो कहानी अब कोई सुनाता नहीं

जाने कितने गए, गली को तुम्हारे
लौट कर वापस, कोई आता नहीं

रफ़्ता-रफ़्ता चाँद निकल आएगा
किसी के बुलाने से,ये आता नहीं

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Avinash Kumar 30 OCT AT 20:11

चाँद के
ललाट पर
इक रोज़ किसी ने
बहुत ही प्रेम से
लेप दिया था
हल्का सा
चंदन
.
.
फिर चाँद ने
कभी मिटाया ही नहीं
प्रेम का वो निशां,
और ये दुनिया
आज तक
समझती है कि
चाँद में दाग है।

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Avinash Kumar 27 OCT AT 9:17

घर गली अंगना, आज जन्नत बना रक्खा है
हर छत की मुंडेर पर, सितारा सजा रक्खा है

हर मकां ही नहीं, हर मन भी हो जाए रौशन
चिरागों से ये पूरा, जहान जगमगा रक्खा है

फिर न आ सके कुछ राम घर अपने वापिस
माँओं ने उनके ख़ातिर दिया जला रक्खा है

कुछ के खत आए हैं, कुछ की है खबर नहीं
बाकी ने अगले साल का मन बना रक्खा है

महताब से आसमां में रोज़ होता है उजाला
इस दफा हमने उसे, ज़मीं पे बुला रक्खा है

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