Avinash   (अविनाश "कर्ण")
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Joined 14 July 2017


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Joined 14 July 2017
Avinash 17 AUG AT 17:24

यूँ रातों के अंधेरे से न घबराइए
आइए चाँदनी रौशनी में आइए

रात को भी है इंतज़ार आपका
आँचल से जरा सितारे लौटाइए

छिप जाएगा ये चाँद बादलों में
आप यूँ बार-बार न मुस्कुराइए

निगाहों ने तो सब कह दिया है
जरा होंठों से भी कुछ सुनाइए

हम न करेंगे अब चाँद की बातें
आइए अब जरा चले भी आइए

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Avinash 15 AUG AT 9:16

पतले धागे की राखी भी कितना भार उठाती है
भाई के हिस्से की बाधा बहनें उधार ले जाती हैं

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Avinash 11 AUG AT 10:20

एक चाँद पे सब हक जताते हैं
वाजिब चाँद का छिप जाना है

बढ़ा दो अब रातें अमावस की
रिवाज इक रात का पुराना है

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Avinash 8 AUG AT 13:52

“ श्रृंगार ”
( अनुशीर्षक में पढ़ें )

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Avinash 5 AUG AT 8:13

महादेव के शून्य में शामिल हो जाते
काश हम कैलाश के काबिल हो पाते

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Avinash 4 AUG AT 12:08

कड़वी ज़ुबाँ से बहोत प्यार देते हैं
बना बनाया अक्सर बिगाड़ देते हैं

जताते नहीं हैं दोस्त दोस्ती अपनी
बस ज़रुरत होने पे संभाल लेते हैं

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Avinash 2 AUG AT 8:29

जो मसअला है सारा बस दिन का ही है
रात तो चाँद देख कर गुज़र ही जाती है

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Avinash 30 JUL AT 13:24

निगाहों में तेरे एक अजब सा ही नशा है
छिपा रक्खा है तूने क्या कोई मयख़ाना

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Avinash 27 JUL AT 11:57

इश्क़ में तेरे ये भी एक काम किया
रोज़-रोज़ एक ख़त तेरे नाम किया

सितारों की ख़्वाहिश की थी तुमने
जाओ मैंने चाँद तुम्हारे नाम किया

आई मुझको जब भी याद तुम्हारी
मैंने याद हमारी पहली शाम किया

चाँद न आया रात ये यूँही बीत गई
क्या चाँद को तूने दूजा काम दिया

बे-पता है एक ख़त न जाने कब से
दिल स्याही से मैंने नीलाम किया

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Avinash 23 JUL AT 21:54

कभी छूने तो कभी पाने की ख़्वाहिश
चाँद को है अपना बनाने की ख़्वाहिश

अधूरा है मिल्कियत-ए-चाँद पे फैसला
है दावेदारों को आजमाने की ख़्वाहिश

है कितना प्रेम एक सितारे को चाँद से
इश्क़ में है बस टूट जाने की ख़्वाहिश

दरिया-ए-इश्क़ है हसीं निगाहें उसकी
ताउम्र के लिए डूब जाने की ख़्वाहिश

ख़त-दर-ख़त जिसे अपना लिखा मैंने
बस इक ख़त उसे पढ़ाने की ख़्वाहिश

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