Arunish Ankit   (गुलमोहर)
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Joined 29 March 2017


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Joined 29 March 2017
Arunish Ankit 9 DEC AT 0:50

यह एक नया दौर है, दौड़-
हर सच, हर बेचैनी, हर खबर को
एक कविता बना देने की-
और फिर भूल जाने की
सब सच-बेचैनी-खबर,
और फिर इन्तेजार करने की
किसी नये "विषय" की-
पर, कुछ खबरें-
कविताएँ नहीं बनती
वो बस अंदर-अंदर कचोटती हैं
खा जाती हैं अंदर ही अंदर
पर बाहर नहीं आती
कविताओं की तरह,
वो कविताएँ जो बहा देती हैं
अंतर में ऊपजे कसक को-
और, शायद बेहतर है यही
कि हम ना लिखें कुछ-
क्योंकि कुछ ज़ख्म
ना भरने को बने हैं,
उन्हें वैसे ही रहने दो-
वैसे ही रहने दो!

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Arunish Ankit 5 DEC AT 20:26

सराय हो गए हैं,
कुछ पराये अपने,
अपने पराये हो गए हैं!

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Arunish Ankit 29 NOV AT 17:16

"मेरे सवालों की ज़द में,
आज तुम हो अगर
तो कल वो भी तो थे-
जहाँ इन्सान जिन्दा
जलाए जाते हो, वहाँ
लब सीकर के जीने में
साँसें भारी लगती हैं!"

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Arunish Ankit 29 NOV AT 0:13

"मुआमला बढ़ता है कभी पर हल ना मिलता है,
दिल के अंदर-सा कहीं कोलाहल ना मिलता है!"

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Arunish Ankit 28 NOV AT 0:05

"कोई ख़्वाहिश नहीं
बची मन में,
पर कुछ ख़्वाब हैं-
अब भी ज़िन्दा है,
आसमां की हदों
को मरोड़ता,
छोटे-छोटे पँखों से-
नादां-सा परिन्दा है!"

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Arunish Ankit 25 NOV AT 23:28

"बड़ी लाचारी में, सजे थे रूह के दूकान,
ख़ालिस फ़रेबी बातें, टूटा हुआ ईमान!"

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Arunish Ankit 25 NOV AT 13:46

अब भी साँस लेती है ज़मीं
थोड़ी बची है अब भी नमी,
बादलों को चीरकर
अब भी रोशनी आती तो है
घुप अँधेरों में हमें वो
राह दिखलाती तो है,
कैसे कह दे रात है तो
फिर सुबह ना आएगी,
लाली ओढ़े आसमां है,
है रुख बदला हवाओं का-
असर होगा दुआओं का!

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Arunish Ankit 25 NOV AT 13:39

खुद को-
ढूँढ कर घर जाएँगे!

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Arunish Ankit 25 NOV AT 1:08

"सच तो ये है कि है मुट्ठी में
समन्दर मेरे, 
ये लहरों-सी लकीरें
हाथ पर जो मेरे उभरती हैं
ये वो क़िस्मत है जो
हम लिखते हैं, खुद ही
खुद ही मिटाते हैं-
ये क़िस्मत-लकीरों 
के फलसफ़े सभी के
एक जैसे हैं, और,
सच तो ये भी है कि है-
मुट्ठी में समन्दर तेरे!"

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Arunish Ankit 23 NOV AT 0:44

"मुझे वहाँ तक जाना है, जहाँ-
परछाईं साथ छोड़ जाती हो,
नदियाँ राह मोड़ जाती हो,
आसमां का ना कोई रंग हो,
हँसने का ना कोई ढंग हो,
जहाँ उम्र एक पहेली हो,
ज़िन्दगी, मौत की सहेली हो,
दिखता है सब मगर अनजान है,
कोई भी शख़्स ना परेशान है-
मुझे वहाँ तक जाना है,
जहाँ-
मैं खुद से मिल पाऊँ अनजाना-सा!"

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