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AMIT RAI (निश्छल)

स्वच्छंद हिंदी लेखन
AMIT RAI YESTERDAY AT 19:04

कुपित चाँद था, बरस पड़ा
अपने दुर्व्यवहारों से,
आस लगी, तथा भानु को
टिमटिम करते तारों से।
(_अनुशीर्षक में पढ़ें...)

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AMIT RAI 19 FEB AT 19:27

दूर क्षितिज पर इक दरवाजा, अंदर रात अकेली;
निर्जन वन दुल्हा बन बैठा, दुल्हन नयी नवेली।
(अनुशीर्षक में पढ़ें)

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AMIT RAI 12 FEB AT 18:00

कवि! तुम डूब गये भावों में,

तिमिर हरेगा कौन?


(○अनुशीर्षक में पढ़ें○)

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AMIT RAI 10 FEB AT 11:16

मैंने विजेता बनने की कभी भी नहीं सोची।
🤔
मैं तो बस, ऐसा अभिनेता बनना चाहता था,
जिसे,
विजेता से अपेक्षाकृत गुणात्मक सम्मान मिलें।

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AMIT RAI 9 FEB AT 18:37

तीर कठोर मनोज चलावत, सृष्टि नयी नित जात निषंगें।
बैरन साँस करें अवलोकनि, नेत्र निहारत प्रेम प्रसंगें।।
वायु सुवासित वेद ऋचामय, साधु रचें नित श्लोक शुभंगे।
काम उमाह धरा पुलकावति, चेतनशील अनंग अनंगे।।
(★please read in the caption★)

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AMIT RAI 7 FEB AT 22:57

(Please Read in Caption)
धवल अंबु सा भला रूप
मानो है खान सुख़न की,
जँचती हैं तेरी यादें
जैसे हों वायु चमन की;

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AMIT RAI 6 FEB AT 21:29

हरियाली फैली तीर तलक,
वसुधा को ढके, रखे छिपाए;
रैन बसेरा करते खगजन,
डैने अपने जरा फुलाए।

°“कवि की निद्रा” कविता का अंश°
【अनुशीर्षक में पढ़ें】

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AMIT RAI 3 FEB AT 11:50

ले लो मेरी कविताओं को
पर मत बंधक इन्हें बनाना,
जालसाज़ के आरोपों से
इनको बहुत दूर ले जाना।
(...अनुशीर्षक में पढ़ें_)

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AMIT RAI 2 FEB AT 13:45

कुंठित भावनाओं को लेकर
मैं सोने जा रहा हूँ,
जद्दोजेहद करके पूरे दिन
दो हलक आज फिर रोने जा रहा हूँ।
(please read in caption)

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AMIT RAI 31 JAN AT 20:46

करतारी करतार की,
स्वयं जियावनहार।
निश्छल मन कर लो सभी,
जो दुर्लभ संसार।।

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