अमित   (निश्छल)
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हाँ, यह सच है कि मेरे कोट्स की संख्या कभी-कभी कम भी हो जाती है।
Joined 8 January 2018


हाँ, यह सच है कि मेरे कोट्स की संख्या कभी-कभी कम भी हो जाती है।
Joined 8 January 2018
अमित 11 HOURS AGO

ज्ञान के दीपक जलाकर
दूर करने को अँधेरे,
ख्याति अर्जन के तरीके
और हैं, बहुधा घनेरे।
जो जगत का मार्गदर्शन, स्वार्थ को तजकर करेगा।
फिर अधूरा चाँद कोई, रात को रौशन करेगा।
)»Please Read in the Caption«(

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अमित 24 MAY AT 22:53

हों निरंकुश मूढ़ सारे,
जब उनींदी साधना हो;
श्लोक, पन्नों पर नहीं जब,
कागज़ों पर वासना हो।
“नाश हो अब सृष्टि का रब”,
चीखकर यह कब कहेगी?

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अमित 24 MAY AT 15:46

नपे-तुले कदमों से चलकर,
पाठक मन में जाना कृतियों;
अल्हड़पन की आतुरता भी,
पीड़ा का अध्याय बनेगी।

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अमित 19 MAY AT 22:53

प्रेमग्रंथ के हर पन्ने पर,
छप जाने की चाह नहीं है;
अपनी दुश्वारी की कोई,
सीधी-समतल राह नहीं है।

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अमित 19 MAY AT 22:45

यूँ कहता है क्या कोई,
सोनम परी ऐ!
कि मेरे गलीचे में जगमग सी कर जा?
गेसू के जूड़े
ये गजरे की ख़ुशबू,
कुरते के मेरे कॉलर में भर जा?
(○}अनुशीर्षक में पढ़ें{○)

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अमित 19 MAY AT 22:25

आज फिर चाँद, मेरे द्वार आया
आज फिर, आँसुओं ने गिड़गिड़ाया,
वो खुशी, जो माँग रखी थी युगों से
भाग्य लेकर, स्वयं मेरे द्वार आया।
)Please Read in the Caption(

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अमित 18 MAY AT 22:56

नहीं दिल्लगी तुम इसे मान लेना,
मैं कह दूँ अगर, मत बुरा मान लेना;
ऐ चंदा, प्रखर धूप में मुँह छिपाये,
क्यों फिरते? न दिखते कहा मान लेना।
(_अनुशीर्षक में पढ़ें...)

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अमित 18 MAY AT 14:18

दुख इस बात का नहीं है कि
हवा के संग उड़ न सका,
तकलीफ़ तो हवा की शर्मिंदगी देती है।

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अमित 18 MAY AT 14:09

मुझे प्यास नहीं है प्रसिद्धि की,
जब महसूस होगी,
तब सीढ़ियों चढ़ कुएँ खोदूँगा।

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अमित 18 MAY AT 13:19

देहात की मिट्टी, सहज
महकान होने लग रही,
श्रद्धेय जन की आन में
संगोष्ठियाँ थीं सज रहीं।
घनघोर वट की छाँव में
वैशाख सिमटा सा पड़ा,
अतितीव्र लू की साँस से
झुलसा हुआ कोने खड़ा।
】अनुशीर्षक में पढ़ें【

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