Abhijeet   (Abby.S.)
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किताबें, इश्क़, और लखनऊ !
Joined 14 May 2019


किताबें, इश्क़, और लखनऊ !
Joined 14 May 2019
Abhijeet 13 FEB AT 23:52

for she looked at worlds
with her bare eyes and
that made difference.


eyes,
wherein
universes collapsed.
convulsions of galaxies
were witnessed.
firsthand.

eyes,
wherein
breath kissed asphyxiation.
gloomy shadows illuminated
hidden faces/phases.
quickly.


for her eyes, were bare.
were beauty therefore.

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Abhijeet 13 FEB AT 23:51

love isn't love, if marketed.
it is then, what you'd define
as "virtual compromise".

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Abhijeet 13 FEB AT 23:50

an old wise man said,
poets are anarchic.



for they dared to strip apart
clothe of pretensions/lies.

they swallowed the nights
but they were starving beings.

trampled tenets of teachings
and seduced/screwed subjects.



saw autumns in beloved's eyes
and claimed, 'here comes spring' !

did marvellous sins and made
devils bow, and satan cry.

were prophets, and were sleuths;
they were themselves, gods too...

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Abhijeet 13 FEB AT 23:49

what you felt, and you wrote is prose.
and that rather compels you to write
is certainly nothing else but poetry.

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Abhijeet 13 FEB AT 23:47

I

down to the sea of perception
this conscience is consistently
diluted; mitigated persistently.

is it me ? dying, impatiently.

II

when of poems, and of pains
sung all the springs and rains,
and of colors, and of climes
we filled our spaces, times,
jars, and bottles of leisure;
we kept close the treasure.

(of darkness, and of death
sung that sinking breath.)

III

She comes up to me, for kiss;
who else, but Parting does this...

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Abhijeet 8 FEB AT 23:55

जब याद आएँगे वो शराफ़त के दिन ,
कुफ़्र में रुलायेंगे वो ज़ियारत के दिन ,

मर्ज़-ए-गर्म-जोशी के मारे हैं जो यहाँ ,
उन्हें सताएँगे ख़लिश-ए-हरारत के दिन ,

जब हम रो रोके थक जाएँगे शायद ,
हँसाएँगे वो विसाल-ए-बशारत के दिन ,

हम उनसे इश्क़ करते रहे तो यकीनन ,
मार डालेंगे वो उल्फ़त-ए-ग़ारत के दिन ,

ये 'ख़्याल' तब से उसके आने लगे हैं ,
जब गुज़रे वो औरों से बग़ावत के दिन !

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Abhijeet 8 FEB AT 23:50

सियाह हाशिये हैं ख़्वाबों के किनारे ,
शरारतें रहती हैं नकाबों के किनारे ,

टूट जाते हैं यूँही बस छूने पे वो ,
नाज़ुक हैं ज़हनी हबाबों के किनारे ,

अदब के हवाले से कई हैं शातिर ,
वो नहीं रहते हैं किताबों के किनारे ,

किनारे आफ़्ताबों के मिलते हैं जो ,
टहलने निकले हैं माहताबों के किनारे ,

इन ख़्यालों में समझ है सियासत की ,
'ख़्याल' रहते हैं इंक़िलाबों के किनारे !

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Abhijeet 8 FEB AT 23:44

क़ल्ब-ए-साक़ी के हाँथों , जाम हैं गिरे ,
यानी हसरतों के बहाने तमाम हैं गिरे ,

जब से मेरी नज़रों में बस गया है वो ,
तब से बने-बनाए सभी मक़ाम हैं गिरे ,

ख़त भेजें हैं उन्हें यूँ तो खाली ही सब ,
मगर काग़ज़ों पे दो बूँद पयाम हैं गिरे ,

उस एक के ख़फ़ा होने पे अभी अभी ,
दिल में क़ायम , मंज़र-ए-निज़ाम हैं गिरे ,

हम तो उनके 'ख़्याल' में यूँ रो पड़े हैं ,
ये आँसू बन के मय-ए-गुलफ़ाम हैं गिरे !

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Abhijeet 8 FEB AT 23:40

बिना सोचे उसे कोई शाम गुज़ारी कहाँ ,
शराबों में उसकी यादों सी ख़ुमारी कहाँ ,

प्यारी तो हैं हमें वो हँसती हुईं निगाहें ,
पर खुशियाँ उन निगाहों से प्यारी कहाँ ,

वो शहर जो है , हम वाकिफ़ हैं उस से ,
उसके जैसा शहर कहाँ , शहरयारी कहाँ ,

बारिशें आती रहीं और साल गुज़रते रहे ,
बाद-ए-फुरक़त सी कहीं अश्क-बारी कहाँ ,

उसके ख़्यालों में भी हाँ अदाएँ है उसकी ,
किसी और 'ख़्याल' में यूँ ख़ाकसारी कहाँ !

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Abhijeet 8 FEB AT 23:37

हमें रोने नहीं देते , ये क्या ग़म हैं सारे,
या तो बेहद हैं या अब भी कम हैं सारे ,

साथ चलते हैं अपने हर वो साया लिए ,
उनके गुज़रते साये वो हम-क़दम हैं सारे ,

इतना क्यों चाहते हैं एक काफ़िर को सब ,
यूँ लगता है की चलते-फिरते हरम हैं सारे ,

उन्हें आसमानों के सजदे हैं हासिल यहाँ ,
यानी हैं जितने भी सितारे , सनम हैं सारे ,

वो अपना 'ख़्याल' ज़ाहिर होने नही देते हैं ,
पर उनकी नज़रों के फ़साने बे-शरम हैं सारे !

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