Aरिफ़ Aल्व़ी   (कोरा काग़ज़....✍ (Arif Alvi))
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Joined 5 February 2019


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Joined 5 February 2019

दुनियादारी में भले ही दिन गुज़ारे तुमने
चाहे कितनों से क्यों न लिए सहारे तुमने

जो आग है अंदर उसको बुझने मत देना
दुनिया के देखे नहीं हैं अभी नज़ारे तुमने

हँसकर सुनाना सभी को दर्द-ए-ज़िन्दगी
भले ही अंदर क्यों न भरे हों अंगारे तुमने

तुम्हारी दुआओं का असर होगा नहीं इन्हें
शायद देखे नहीं पीठ पीछे के इशारे तुमने

अकेले चला लो सपनों की गाड़ी "आरिफ़"
रोक ही देंगे अगर ईंधन इनके पुकारे तुमने

"कोरा काग़ज़" है ज़िन्दगी लिखते चलो तुम
कलम अगर जब ले ही लिए हैं दुलारे तुमने

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उन्हें अंदाज़ा नहीं था उनकी हरियाली का
वरना कभी दिल ना तोड़ते ये घरवाली का

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इधर चले आओ हम बिछड़ जाएँ
अपनी अपनी जगह से उखड़ जाएँ

ये ज़माना मिलने नहीं देगा अब हमें
क्यों न इनके कहने पर बिगड़ जाएँ

इतने दिनों से एक दूजे में सिले हुए
आओ इनके कहने पर उधड़ जाएँ

लोग प्यार पसंद नहीं करते "आरिफ़"
आओ आज इस प्यार से लड़ जाएँ

"कोरा काग़ज़" होता है इश्क़ सुना है
चलो ये इश्क़ लिखें और पकड़ जाएँ

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फिर एक दिन निकल गया है
तारे गिन गिन निकल गया है

मौक़ा है कुछ कर दिखाने का
इंसाँ जाने क्यों फिसल गया है

हर रात में तारे नहीं होते लोगों
चमका वही जो संभल गया है

हौसलों की लौ जला "आरिफ़"
इससे पत्थर भी पिघल गया है

"कोरा काग़ज़" ही जाएगा यहाँ से
गुनाह का ज़र्रा-ज़र्रा भी गल गया है

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तकिया परेशान है तन्हाई की करवटों से
आँसुओं से भीगे या डरे बस सिलवटों से

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मेरे एहसासों का असरार हैं, तुम्हारे गर्म हाथ
जब छूते मुझको हर बार हैं, तुम्हारे गर्म हाथ

तुम्हारा ये चेहरा ताबनाक भले ही क्यों न हो
मुझे मोहब्बत का इज़हार हैं, तुम्हारे गर्म हाथ

तुमसे मिलना और बातें करना एक बहाना है
मेरे जिस्म की अब दरकार हैं, तुम्हारे गर्म हाथ

रुख़सार को छूना क्या रिवायत है "आरिफ़"
मेरे होने को अब तैयार हैं, तुम्हारे गर्म हाथ

ये "कोरा काग़ज़" जैसा एहसास देते हैं मुझे
कलम-अल्फाज़ का प्यार हैं, तुम्हारे गर्म हाथ

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संकट के बादल छँट जाएँगे
जो दुख हैं वो भी हट जाएँगे

सुख में सुमिरन करो प्रभू को
दुख अपने आप ही घट जाएँगे

प्रेम भाव से सबसे तुम बोलो
दुश्मन दो हिस्सों में बँट जाएँगे

कुकर्मी अब जिया न "आरिफ़"
ऐसों के दस्तावेज़ ही फट जाएँगे

"कोरा काग़ज़" भरो नेकियों से
कलम को संस्कार भी रट जाएँगे

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कितने दिन दूर रहे हैं हम दोनों
कितना मजबूर रहे हैं हम दोनों

मिलकर अब सुकून मिला हमें
प्यार से भरपूर रहे हैं हम दोनों

एक दूजे के बिना अधूरे हैं हम
मिलन का दस्तूर रहे हैं हम दोनों

मैं हमेशा तुम्हारी रहूँगी "आरिफ़"
तभी चेहरे का नूर रहे हैं हम दोनों

"कोरा काग़ज़" है हमारी ज़िन्दगी
इश्क़ लिख भरपूर रहे हैं हम दोनों

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सभी चेहरों के नक़ाब देखकर चलो
लोगों का मुँह जनाब, देखकर चलो

एक चेहरे पर कई चेहरे होते हैं यहाँ
चेहरा है खुली किताब, देखकर चलो

बेवजह ख़ुशियाँ लूट लेते हैं लोग अब
तुम बस अपना हिसाब देखकर चलो

काँटे चुभाने में माहिर हैं लोग "आरिफ़"
अपने हाथों का गुलाब देखकर चलो

हर किसी को "कोरा काग़ज़" समझते हैं
तुम कलम ने दिया जवाब देखकर चलो

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कभी किसी को खो देने का डर
कभी दिल में दर्द बो देने का डर

बहुत थपथपाता हूँ टूटे दिल को
पर सताता है क्यों रो देने का डर

लोग आते हैं समझा कर जाते हैं
नहीं चाहता उम्मीदें धो देने का डर

ये दिल बहुत अनाड़ी है "आरिफ़"
मत पाल जाग कर सो देने का डर

"कोरे काग़ज़" पर लिख तो सही
तब जाएगा आँखें भिगो देने का डर

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