Indu Singh

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पका गेंहूँ, खरे सोने सी चमक उसकी 
बंद मुट्ठी में, भरी हुई खनक उसकी
पिस जाती है ज़िंदगी की ज़रूरतों के बीच।
सोने सा रंग, दूधिया हो चला 
थोड़ा और पका, फिर ख़त्म !!!

24 APR AT 18:25

यादों का बसेरा है 'रूह' की गली में
जिस्म बौखलाया, न रूह ढूँढ़ पाए ...

4 APR AT 9:50

कुछ रिश्ते गुल्लक में सहेजे हैं बड़े जतन से
डर बस इतना कि नाज़ुक है गुल्लक बहुत ।

22 MAR AT 12:08


इश्क बिना ज़िंदगी का गुज़ारा हुआ है कब 
ये तड़प का ही रिश्ता हमारा हुआ है अब !!

1 MAR AT 15:47

होते जो बड़ी शाख हम पड़ती नज़र तुम्हारी
नन्ही छोटी टहनियों को भला कौन देखता है !

25 FEB AT 10:31

क्या लिखूँ प्रेम पर प्रेम अंतहीन है
एक सच ये भी कि प्रेम ही दीन है
प्रेम की प्रीत का न कोई मापदण्ड 
प्रेम है प्रेम है और प्रेम ही बस प्रेम है

23 FEB AT 10:05

न अदब तमीज़ तहज़ीब, न बचा है कुछ शेष
आँधी ऐसी चल रही,अजब हुआ परिवेश ।

16 FEB AT 19:48

भ्रम की दुनिया में भ्रम के रिश्ते भ्रम से ही चलते 
भ्रम हुआ कि दिन है भ्रम हुआ कि रात 
भ्रम भरी दोपहर में भ्रमित हुआ मन भी
जो दिख रहा वो भ्रम है जो न दिखा वो भ्रम 
गुजार रहे ज़िंदगी इसी भ्रम में हम सभी !!!

11 FEB AT 23:28


कितने अजीब हो तुम 
' वक्त '
कभी तो पता ही नहीं चलता तुम्हारा 
और कभी...
काटे ही नहीं कटते !!!

8 FEB AT 18:38